दुविधा रही मन में गहन अभ्यास के उपरांत भी
तरकश में तो इस जिंदगी के सज गए सिद्धांत भी
दर्शन यही लेकर सृजन भी कर रहा है पुण्य का
श्रम कर्मयोगी का रहा है वेद भी वेदांत भी
आधे - अधूरे ही रहे हैं हम शिखर पर क्या कहें
श्रेणी हमारी बुद्धिजीवी हो चुका दीक्षांत भी
जो सामयिक है सामना उसका सतह पर है कठिन
उपजी क्षणिक उत्तेजना ने कर दिया मन क्लांत भी
लगती बुरी आलोचना मशहूरियों के मध्य में
जो चढ़ चुका है आवरण रखता वही उद्भ्रांत भी
क्या युक्तियाँ मन में धरें जब नीतियाँ भी साथ हों
रख वर्जनाओं में हृदय हमने चुना एकांत भी
दिल चाहता है वो रहे बच्चों सा बिल्कुल निष्कपट
हो फ़लसफ़ा ऐसा सहज मेरे लिए दृष्टांत भी
*** मदन प्रकाश सिंह

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