नहीं है आस अपनों से नहीं अधिकार आख़िर क्यों
भरी आँखें मगर है प्यार का इज़हार आख़िर क्यों
ख़ुदा ने नेमतें प्यारी हमें बख़्शी हुईं लेकिन
कपट छल बेइमानी से भरा संसार आख़िर क्यों
कभी बेटी किसी पर बोझ तो होती नहीं फिर भी
उठा दी बेरहम हो बीच में दीवार आख़िर क्यों
बराबर हैं सभी इंसां न कोई फर्क इनमें है
तो फिर चारों तरफ ये ख़ून की बौछार आख़िर क्यों
दिखावा ख़ुदफ़रेबी का लगी कुछ होड़ है ऐसी
हुए मगरूर रिश्तों में अजब व्यवहार आख़िर क्यों
गए हो छोड़ कर जब से लगे वीरान ये दुनिया
सुकूनो चैन को खोकर पड़े मँझधार आख़िर क्यों
ठिकाना चंद दिन का है तमाशा कुछ घड़ी का है
भला फिर कर रहे भाई यहाँ तक़रार आख़िर क्यों
*** कान्ति शुक्ला

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