तन को सतरंगी करें, ये होली के रंग।
मन उत्फुल्लित उछलता, ऐसी उठे तरंग।
ऐसी उठे तरंग, खुशी लहराती लहरे।
दुख नैराश्य विषाद, दूर तक कहीं न ठहरे।
मिटा मनों का मैल, एक कर देती मन को।
पिचकारी की धार, हृदय सँग रँगती तन को।
समरसता में घोलता, जीवन का जो रंग।
हो हुल्लड़ के साथ है, होली का हुड़दंग।
होली का हुड़दंग, पहन फूलों के गजरे।
गालों मले गुलाल, चेहरे हैं चितकबरे।
खाते हैं मिष्ठान्न, भेद बिन सब समता में।
होली का त्यौहार, भरे रँग समरसता में।
डॉ. राजकुमारी वर्मा




