Sunday, 18 October 2026

हे माँ दुर्गे!

 

हे माँ दुर्गे!
तुम जगत जननी हो
असुरों का संहार करती हो
पर माँ/मनुष्य के भीतर पलते असुरों का क्या?
वे असुर/ जो तुम्हारे मंदिर में शीश झुकाते हैं
और बाहर मनुष्यता का गला घोंट देते हैं
हे माँ! अब तुम्हें आकाश से उतरने की नहीं
हमारे भीतर जागने की आवश्यकता है
हमारे साहस में/हमारे विवेक में/
अन्याय के विरुद्ध उठती आवाज़ में
मुझे वरदान नहीं/सत्य के लिए
खड़े होने का साहस देना माँ
जब तुम विदा होना विजय दशमी को
तो अपने साथ ले जाना हमारे
भीतर का भय और अहंकार/और छोड़ जाना
हर हृदय में थोड़ी-सी दुर्गा
ताकि तुम्हारी सच्ची विजय मंदिरों में नहीं
मनुष्य के चरित्र में दिखाई दे
हे माँ दुर्गे/ मुझे तुम्हारी प्रतिमा नहीं
अपने भीतर की दुर्गा जगानी है
जो मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं
खड़ा हो सकूँ/अन्याय के विरुद्ध
चुनौती दे सकूँ अधर्मी को
बस इतनी ही इल्तजा है माते
मेरी करुण पुकार सुन लेना
*** राजेश कुमार सिन्हा

Sunday, 11 October 2026

प्रेम बिना सब सूना - एक गीत

 

प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।
प्रेम बिना सब रिश्ते बन्धन, लगता जीवन खार।

भाव-भूमि का मधुरिम अंकन, रचता नव आह्लाद।
प्रेम-प्रकाश परावर्तित हो, देता दीप्ति प्रसाद।
जड़-चेतन अवनी अम्बर का, प्रेम बना आधार।
प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।

पारावार प्रेम का शाश्वत, अनुपम और अगम्य।
प्रेम सच्चिदानन्द रूप है, पावन और प्रणम्य।
प्रेम-प्रभा से जगमग रहता, यह व्यापक संसार।
प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।

प्रेम-सुधा से तृप्त हृदय हो, मिटे सकल संताप।
प्रेम जगाता है प्राणों में, करुणा का आलाप।
दीप जलाए आत्म-प्रभा का, प्रेम करे उद्धार।
प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 4 October 2026

तमस हटाता नित्य सवेरा - गीत

 

जीवन के इस महा समर में, सुख-दुख ने मानव को घेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।

 

पतझड़ का मौसम जाने पर, बासंती मौसम भी आता।
शूल बिछी जब राह पार हो, सुगम राह पर पाँव बढ़ाता।।
होगा ही अनुकूल समय पर, कभी मनुज के पग का फेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, त मस हटाता नित्य सवेरा।।

 

वक्त एक सा कभी न रहता, बुरा समय भी टल ही जाता।
लोभ-मोह से बंधन तोड़ें, मैल दिलों से तब मिट पाता।।
हटी नहीं यदि धुन्ध हृदय से, तभी घेरता रहें अँधेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।

 

शीत काँपता देख कृषक को, आतप ठंडा पड़ जाता है।
ओलों की चोटों को सहकर, लिए फावड़ा वह आता है।।
अंत भला तो सब भला कहे, नए रंग मन भरें चितेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।

 

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

Sunday, 27 September 2026

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

 

उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल।
उड़ते पाखी दल से खेले, पवन बावरा चंचल।
सूखे तरुवर हरित शाख से, करतल ताल-बजाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

बिजुरी कौंधी रेखांकित से, जगमग धरती रानी।
गीत प्रीत के गाती जाए, ओढ़े चूनर धानी।
इन्द्रधनुष की आभा लेकर, किरणों के दल आए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

बुध-बुध खोकर प्रीतम प्यारा, भीगा मन्मथ डोले।
कली गली में गुंजित सरगम, मधुकर मदिरा घोले।
आशाओं का मधुबन फिर से, अनहद प्यास-बुझाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 20 September 2026

"गणेश चतुर्थी पर विशेष आयोजन" - लीला छन्द पर आधारित गीत

 

मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥

गौरी-शिव सुत गणेश, शीश शशि कुंचित केश।
ऋद्धि-सिद्धि-प्रिय सुवेश, द्वार खड़े श्री-जयेश।
वस्त्र खचित स्वर्ण-तार, मुक्ता-मणि हार डार।
मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥1॥

चतुरानन एकदन्त, षड्मुख-सुहृद् गुणवन्त।
कैथ-जम्बु फल अपार, जवाकुसुम कंठहार।
गंधराज तिलक सार, मस्तक पर मुकुट धार।
मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥2॥

शुभागमन श्रीगणेश, चरण-कमल गृह-प्रवेश।
शोभित कर नागपाश, करे सभी विघ्न-नाश।
बुद्धि ज्ञान को निखार, विद्या देने अपार।
मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥3॥

*** कुन्तल श्रीवास्तव

(शब्दार्थ : कुंचित- घुँघराले, श्री-जयेश- गौरी-गणेश, षड्मुख-सुहृद्- कार्तिकेय के भाई, जवाकुसुम- गुड़हल, गंधराज- चंदन, सार- लगा कर)

Sunday, 13 September 2026

एक प्रेम प्रसंग - सार छंद

 

जीवन नभ पर खिला चाँद वह, दिन के थकते आए।
मन के सागर में डूबे फिर, भावों में उतराए।
कैसे उसे निहारूँ जी भर, कैसे प्यार जताऊँ।
लज्जा के बादल से उसको, कैसे बाहर लाऊँ।।

कहूँ प्रेमिका मन मन्दिर में, आकर दीप जलाओ।
मेरे मन की सुनों व्यथाएँ, कुछ अपनी कह जाओ।
श्वास डोर यह टूट रही है, विरह नहीं सह पाऊँ।
प्यारी कहीं अकारण देही, मैं अनंग हो जाऊँ।।

*** फणीन्द्र कुमार ‘भगत’ 

Sunday, 6 September 2026

श्री कृष्ण जन्माष्टमी - एक गीत

 

निर्गुणी प्रगटे चतुर्भुज योगमाया पावनी है।
दामिनी दमके सहस्रों यामिनी रस सावनी है।

अवतरण सोलह कलाओं में सजाई सगुण काया।
बाल छवि चंचल चपल चपला दमकती प्रकुल छाया।
वास कण कण में उसीका सजल करुणा सिन्धु छल-छल।
साँवरा मुख अंग शोभित अनवरत रसधार कल-कल।
रूप शुभ अनपायनी प्रभु स्वयंभू सित छावनी है।

मुख भरे ब्रह्माण्ड खेले अंग माटी में लपेटे।
देख मैया रोष सहमे विहस आँचल ओढ़ लेटे।
झाँपते मुख केश कुंचित चन्द्र पर ज्यों घन घने हों।
बोल बोले तोतले झरते कमल मंजरि सने हों।
जीवनी स्यंदन प्रवेता सिन्धु तरणी लावनी है।

गोप गोपी संग नटखट केलि यमुना तीर साजे।
राधिका धुन सप्त स्वर में वियोगी रस वेणु बाजे।
मदन लज्जित हैं सहस्रों श्याम कमली पीत कटि पट।
मोरपाखी शीश शोभित सिद्ध योगी यमुन रज तट।
कृष्ण छलिया जग नियंता भव्य गीता स्रावनी है।
निर्गुणी प्रगटे चतुर्भुज योगमाया पावनी है।
*** सुधा अहलुवालिया
रथ / स्यंदन प्रवेता / सारथी

हे माँ दुर्गे!

  हे माँ दुर्गे! तुम जगत जननी हो असुरों का संहार करती हो पर माँ/मनुष्य के भीतर पलते असुरों का क्या? वे असुर/ जो तुम्हारे मंदिर में शीश झुकात...