अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार।
जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार।।
यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक।
कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द अतिरेक।।
निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच।
पर्दा गिरते ही मिटें, झूठे सभी प्रपंच।।
आदि-अन्त के मध्य को, मंच करे साकार।
इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार।।
आया जो इस मंच पर, गूँजे उसका नाम।
हुआ अँधेरा बोलता, किरदारों का काम।।
करे उजागर मंच पर, सच को हर किरदार।
हरदम होती अंत में, सदा झूठ की हार।।
मंच आइना वक्त का, जिसमें जीवन काल।
विधिना के इस चक्र का, अम्बर बड़ा विशाल।।
*** सुशील सरना






