Sunday, 21 June 2026

बात फूलों की - एक ग़ज़ल

 

प्यार की बात - बात फूलों की
किसने पूछी है जात फूलों की

दूर इंसान से हुआ इंसां
हर इबादत हयात फूलों की

दिन में महके हैं रात में महके
खिलखिलाती जमात फूलों की

इश्क़ काँटे समेटने आया
जा चुकी जब बरात फूलों की

ग़म-ए-दुनिया है ग़म का साया भी
कौन भूला है रात फूलों की

वक़्त मरहम लगा के छोड़ गया
ज़ख्म लिखते हैं घात फूलों की

छेद देता है होंठ से लकड़ी
कैद भँवरा है मात फूलों की
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मदन मोहन शर्मा

Sunday, 14 June 2026

किसान

 

किसान
एक ऐसा मेहनती शख्स
जो बोता है उम्मीद सींचता है विश्वास
और काटता है संघर्ष
उसके हाथों की दरारों में
मौसमों का इतिहास लिखा होता है
उसके माथे पर चमकता पसीना
यूनिवर्सिटी की डिग्री से कम नहीं होता
वह हमेशा जागता रहता है
ओस की नमी और अंधेरे की चुप्पी के बीच
बादल उसके लिए कविता नहीं बल्कि
भाग्य का प्रश्न होते हैं और
बारिश उसके लिए रोमांस नहीं
रोटी का जुगाड़ होती है /है ना
कितनी अजीब बात जिसके हाथ
पूरे देश का पेट भरते हैं/अक्सर उसी
की थाली अधूरी रह जाती है
सूखा, बाढ़, कर्ज़ और बाज़ार
उसकी परीक्षा लेते हैं
फिर भी वह हार नहीं मानता
क्योंकि वह जानता है कि
जीवन का अर्थ संग्रह में नहीं
बेशक सृजन में है और किसान वह है
जो मिट्टी से सोना नहीं बनाता
बल्कि मिट्टी से जीवन बनाता है
जब भी किसी घर में
रोटी की खुशबू आती है
तब कहीं न कहीं
एक किसान का श्रम
मौन होकर मुस्कुराता है
पर एक सच तो यह भी है कि
धरती का सबसे उपेक्षित और निरीह
प्राणी किसान ही तो होता है
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***राजेश कुमार सिन्हा

Sunday, 7 June 2026

कहानी अग्नि की

 

'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।
यदि सृजन का मंत्र है यह, तो प्रलय की भी निशानी।

यज्ञ में हो प्रज्ज्वलित यह, देवता का भाग लेती।
शीत से व्याकुल धरा को, उष्णता का दान देती।
दीप बनकर पथ दिखाती, विश्व को यह ज्योति दानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

जब तपोबल बन धधकती, लक्ष्य कब रहता प्रतीक्षित।
चढ़ शिखर पुरुषार्थ के हों, प्राप्य सारे ही अभीप्सित।
किन्तु अनियंत्रित हुई तो, भस्म कर देती जवानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।

क्रोध बनकर यदि भड़कती, तोड़ देती नेह बन्धन।
नष्ट होती सभ्यताओं, की बनी है मूक क्रन्दन।
बोल हो संयम सधे यदि, प्रेम की गंगा बहानी।
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 31 May 2026

जीवन का यह मंच - दोहे

 

अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार।
जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार।।

यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक।
कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द अतिरेक।।

निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच।
पर्दा गिरते ही मिटें, झूठे सभी प्रपंच।।

आदि-अन्त के मध्य को, मंच करे साकार।
इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार।।

आया जो इस मंच पर, गूँजे उसका नाम।
हुआ अँधेरा बोलता, किरदारों का काम।।

करे उजागर मंच पर, सच को हर किरदार।
हरदम होती अंत में, सदा झूठ की हार।।

मंच आइना वक्त का, जिसमें जीवन काल।
विधिना के इस चक्र का, अम्बर बड़ा विशाल।।

*** सुशील सरना

Sunday, 24 May 2026

एक बेहतरीन ग़ज़ल - हो फ़लसफ़ा ऐसा

 

दुविधा रही मन में गहन अभ्यास के उपरांत भी
तरकश में तो इस जिंदगी के सज गए सिद्धांत भी

दर्शन यही लेकर सृजन भी कर रहा है पुण्य का
श्रम कर्मयोगी का रहा है वेद भी वेदांत भी

आधे - अधूरे ही रहे हैं हम शिखर पर क्या कहें
श्रेणी हमारी बुद्धिजीवी हो चुका दीक्षांत भी

जो सामयिक है सामना उसका सतह पर है कठिन
उपजी क्षणिक उत्तेजना ने कर दिया मन क्लांत भी

लगती बुरी आलोचना मशहूरियों के मध्य में
जो चढ़ चुका है आवरण रखता वही उद्भ्रांत भी

क्या युक्तियाँ मन में धरें जब नीतियाँ भी साथ हों
रख वर्जनाओं में हृदय हमने चुना एकांत भी

दिल चाहता है वो रहे बच्चों सा बिल्कुल निष्कपट
हो फ़लसफ़ा ऐसा सहज मेरे लिए दृष्टांत भी

*** मदन प्रकाश सिंह

Sunday, 17 May 2026

आख़िर क्यों - कड़वी हक़ीक़त की एक ग़ज़ल

 

नहीं है आस अपनों से नहीं अधिकार आख़िर क्यों
भरी आँखें मगर है प्यार का इज़हार आख़िर क्यों

ख़ुदा ने नेमतें प्यारी हमें बख़्शी हुईं लेकिन
कपट छल बेइमानी से भरा संसार आख़िर क्यों

कभी बेटी किसी पर बोझ तो होती नहीं फिर भी
उठा दी बेरहम हो बीच में दीवार आख़िर क्यों

बराबर हैं सभी इंसां न कोई फर्क इनमें है
तो फिर चारों तरफ ये ख़ून की बौछार आख़िर क्यों

दिखावा ख़ुदफ़रेबी का लगी कुछ होड़ है ऐसी
हुए मगरूर रिश्तों में अजब व्यवहार आख़िर क्यों

गए हो छोड़ कर जब से लगे वीरान ये दुनिया
सुकूनो चैन को खोकर पड़े मँझधार आख़िर क्यों

ठिकाना चंद दिन का है तमाशा कुछ घड़ी का है
भला फिर कर रहे भाई यहाँ तक़रार आख़िर क्यों

*** कान्ति शुक्ला


Sunday, 10 May 2026

'मान' सहित विश्वास जगाकर - एक गीत

गीत गुनेंगे सरगम अपने, नित्य नये अहसास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

सरस लालिमा प्राचीरों पर,
आभा-मण्डल कर दे अर्पित।
मदिर मदिर तन पवन दुलारे,
माटी महके सोंधी सिंचित।
गुन-गुन का इकतारा छेड़े, चंचल भँवरे हास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

विकट वेदना द्रुतगामी हो
राग-द्वेष को होम करें हम।
ऋण अनंत वसुधा के वीरों,
सिंहनाद को व्योम करें हम।
संस्कृति के सम्मान-मान से,नवल पंथ विन्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

घिरी साँझ जो धरा गगन तक,
पथ दीप्तिमान करना प्रतिपल।
तरल तरंगित अंतस्तल में,
रत्नाकर सा होगा हलचल।
मंत्र मुग्ध सी करे रागिनी,”लता” अनछुई प्यास जगाकर।
राष्ट्र चेतना रोम-रोम में, 'मान' सहित विश्वास जगाकर।

*** डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी  

बात फूलों की - एक ग़ज़ल

  प्यार की बात - बात फूलों की किसने पूछी है जात फूलों की दूर इंसान से हुआ इंसां हर इबादत हयात फूलों की दिन में महके हैं रात में महक...