नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।
करुण हृदय हो सहज वेदना, थाती ये अनमोल।
ओढ़ आवरण जन्म-मृत्यु का,
राजा हो या भृत्य।
उजले तन का मान करे मन,
कहते जिसे अनित्य।
अपना-अपना कहकर हम-सब, बड़े न बोलें बोल।
नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।
पंचतत्व से निर्मित काया,
नेति-नेति से नेत।
सत्य सनातन संस्कृति कहती,
भाव भरे समवेत।
दुहराता इतिहास स्वयं ही, दुनिया अपनी गोल।
नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।
धर्म-कर्म से इसे सँवारें,
दाता का उपमान।
रोग-दोष से रक्षित प्रतिपल,
ऊर्जा भर दे प्राण।
'लता' प्रेम के बंधन में नित, मृदुता देती घोल।
नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।
*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी






