Sunday, 22 March 2026

ईश्वर का वरदान - वृक्ष

 

पेड़ों से धरती की शोभा, कहते संत सुजान।
पेड़ लगाएँ पेड़ लगाएँ, मिलकर सब इंसान।।
इनसे लाभ बहुत हैं हमको, कहता है विज्ञान।
हरे पेड़ को नहीं काटना, हो भारी नुकसान।।

प्राण वायु मिलती है इनसे, जो जीवन आधार।
बात मान लो मेरी भाई, करो वृक्ष से प्यार।।
पशुओं को देते ये भोजन, ठंडी छाँव अपार।
खग-वृंदो के नीड़ यही हैं, सबका है उपकार।।

औषधि के भंंडार यही हैं, करते हमें निरोग।
भारत भू पर करते आए, हम इनका उपयोग।।
पुष्प फलों के हैं ये दाता, ईश्वर के वरदान।
कई तरह से पूरे करते, हम सबके अरमान।।

वेद हमें समझाते आए, देव इन्हें लो मान।
वृक्ष काटना बड़ा पाप है, बनें नहीं नादान।।
जनसंख्या अभिशाप बन रही, उजड़े हैं वन खूब।
जंगल को हम खूब बढ़ाएँ, बन करके महबूब।।
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*** मुरारि पचलंगिया

Sunday, 15 March 2026

युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है - एक गीत

 


युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।
दर्प में आघात का व्रण बो गया है।

पाथ चुनते हैं समर का स्वार्थ में जो।
व्यग्र होती चेतना मृतप्राय हैं वो।
भार ले उत्तेजना को ढो रहा तन।
अनवरत अधिकार लोलुपता भरा मन।
आदि का सुर-ताल बेबस सो गया है।

युद्ध का परिणाम विध्वंसक सदा ही।
प्रति दिशा भयभीत रहती है कदा ही।
कृष्ण ला्ते शांति का प्रस्ताव पावन।
ठानता जो बैर वो है दुष्ट रावन।
भाव कुंठित करुण रस को धो गया है।

द्वेष पारावार अंतस को गलाता।
छेड़ता संग्राम निज प्रतिभा छलाता।
हैं बरसते क्रोध में जो अग्नि के कण।
क्षार करते हैं सभी संवाद के पण।
अंत का अध्याय जैसे खो गया है।
युद्ध का पर्याय जीवन हो गया है।

*** सुधा अहलुवालिया

 


Sunday, 8 March 2026

होली के रंग - कुण्डलिया छंद

 

तन को सतरंगी करें, ये होली के रंग।
मन उत्फुल्लित उछलता, ऐसी उठे तरंग।
ऐसी उठे तरंग, खुशी लहराती लहरे।
दुख नैराश्य विषाद, दूर तक कहीं न ठहरे।
मिटा मनों का मैल, एक कर देती मन को।
पिचकारी की धार, हृदय सँग रँगती तन को।
समरसता में घोलता, जीवन का जो रंग।
हो हुल्लड़ के साथ है, होली का हुड़दंग।
होली का हुड़दंग, पहन फूलों के गजरे।
गालों मले गुलाल, चेहरे हैं चितकबरे।
खाते हैं मिष्ठान्न, भेद बिन सब समता में।
होली का त्यौहार, भरे रँग समरसता में।
डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 1 March 2026

ज़िंदगी का सच - मुक्तक

 

उसूलों की लड़ाई में, मुहब्बत हार जाती है।
फरेबी हो अगर सज़दे, इबादत हार जाती है।।
जिसे छलना फ़क़त आता, हिमायत वो करे सच की,
यही दस्तूर दुनिया का, शराफ़त हार जाती है।।

कहीं पर प्यार बिकता है, कहीं ईमान बिकता है।
खरीदोगे अगर तुम भी, जहाँ में ज्ञान बिकता है।।
शराफ़त की सभी बातें, किताबी फलसफ़ा यारों,
हक़ीक़त नोट की समझो, यहाँ इन्सान बिकता है।।

*** विजय मिश्र दानिश


Sunday, 22 February 2026

उर्वर भू यह भारत की - एक गीत

 

संतों की यह पावन धरती, अखिल जगत में न्यारी है।
मातृभूमि को माता कहते, जन्म दिया बलिहारी है।।

कलकल करती बहे जहाँ पर, नदियों की पावन धारा।
जम्बू द्वीपे आर्याव्रत का, कहलाता था यह प्यारा ।।
हिम किरीट सा श्वेत हिमालय, हरित उर्वरा धरणी है।
कलकल करती नदियाँ बहती, लगती कितनी प्यारी है।।

रवि की किरणें यहाँ भूमि पर, नित स्वर्णिम रूप बिखेरे।
अलख जगाने हुए यहाँ पर, कितने ही सन्त चितेरे।।
जन्में वीर हजारों कितने, उर्वर भू यह भारत की।
सदा शत्रुओं से रक्षा करने, सदा रही तैयारी है।।

वायु नीर क्यों करे प्रदूषित, श्वास कहाँ जाकर लेना।
भारत भू के जंगल पर्वत, और नहीं कटने देना।।
भरा खजाना भारत माँ का, अब कोई लूट न पाए।
इसे बचा कर्त्तव्य निभाना, निश्चित जिम्मेदारी है।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

Sunday, 15 February 2026

सबके पालन हार - एक गीत

 

सत्य सनातन नाम ईश का, सबके पालन हार।
सनद साधना डगमग है प्रभु, हाथ गहो पतवार।

जग के हो आराध्य देव तुम, चित्तवृत्ति अविनाश।
यही कल्पना युग मन्वंतर, अरि को करे निराश।
भूल रहें जो वेद ऋचाएँ, वंशज हैं हम आर्य,
अविनाशी को कहे सनातन, पंच तत्व में सार।

भेदभाव मतिसुप्त करें जो, क्षुद्र हृदय भयभीत।
धीर धरे साधक मन मंदिर, सुखकर ये संगीत।
रही सदी से मुखर चेतना, बढ़ा रहे संताप,
अंश अनागत समझ न पाये, विकल नीति आधार।

महिमा करें बखान पुण्यपथ, राम-रमा अनिकेत।
मर्यादा को लाँघा जिसने, दुष्ट हृदय समवेत।
क्षुद्र ग्रहों की भाँति मिटेंगे, कालनेमि सम दैत्य,
संस्कृति का आधार तुम्हीं हो, हे मेरे करतार।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 8 February 2026

ब्रह्म का स्वरूप माँ

 

सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती।
कण्ठ से लगा कभी ममत्व से निहारती।
क्षीर के प्रसाद से भरा प्रणम्य कूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

कोमलांगिनी, सुभाषिनी,अगाध वत्सला।
शौर्य से बनी कभी सशक्त ढाल अर्गला।
कष्ट वृष्टि में लगे सदा सुरम्य धूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

आदि है अनंत है, अशेष है, विशेष है।
सृष्टि के प्रसार का पुनीत शेष, श्लेष है।
कोटि-कोटि सूर्य चन्द्र सी अगम्य भूप माँ।
जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ।

*** अर्चना सिंह 'अना'

ईश्वर का वरदान - वृक्ष

  पेड़ों से धरती की शोभा, कहते संत सुजान। पेड़ लगाएँ पेड़ लगाएँ, मिलकर सब इंसान।। इनसे लाभ बहुत हैं हमको, कहता है विज्ञान। हरे पेड़ को नहीं काटन...