Sunday, 20 September 2026

"गणेश चतुर्थी पर विशेष आयोजन" - लीला छन्द पर आधारित गीत

 

मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥

गौरी-शिव सुत गणेश, शीश शशि कुंचित केश।
ऋद्धि-सिद्धि-प्रिय सुवेश, द्वार खड़े श्री-जयेश।
वस्त्र खचित स्वर्ण-तार, मुक्ता-मणि हार डार।
मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥1॥

चतुरानन एकदन्त, षड्मुख-सुहृद् गुणवन्त।
कैथ-जम्बु फल अपार, जवाकुसुम कंठहार।
गंधराज तिलक सार, मस्तक पर मुकुट धार।
मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥2॥

शुभागमन श्रीगणेश, चरण-कमल गृह-प्रवेश।
शोभित कर नागपाश, करे सभी विघ्न-नाश।
बुद्धि ज्ञान को निखार, विद्या देने अपार।
मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...!
सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥3॥

*** कुन्तल श्रीवास्तव

(शब्दार्थ : कुंचित- घुँघराले, श्री-जयेश- गौरी-गणेश, षड्मुख-सुहृद्- कार्तिकेय के भाई, जवाकुसुम- गुड़हल, गंधराज- चंदन, सार- लगा कर)

Sunday, 13 September 2026

एक प्रेम प्रसंग - सार छंद

 

जीवन नभ पर खिला चाँद वह, दिन के थकते आए।
मन के सागर में डूबे फिर, भावों में उतराए।
कैसे उसे निहारूँ जी भर, कैसे प्यार जताऊँ।
लज्जा के बादल से उसको, कैसे बाहर लाऊँ।।

कहूँ प्रेमिका मन मन्दिर में, आकर दीप जलाओ।
मेरे मन की सुनों व्यथाएँ, कुछ अपनी कह जाओ।
श्वास डोर यह टूट रही है, विरह नहीं सह पाऊँ।
प्यारी कहीं अकारण देही, मैं अनंग हो जाऊँ।।

*** फणीन्द्र कुमार ‘भगत’ 

Sunday, 6 September 2026

श्री कृष्ण जन्माष्टमी - एक गीत

 

निर्गुणी प्रगटे चतुर्भुज योगमाया पावनी है।
दामिनी दमके सहस्रों यामिनी रस सावनी है।

अवतरण सोलह कलाओं में सजाई सगुण काया।
बाल छवि चंचल चपल चपला दमकती प्रकुल छाया।
वास कण कण में उसीका सजल करुणा सिन्धु छल-छल।
साँवरा मुख अंग शोभित अनवरत रसधार कल-कल।
रूप शुभ अनपायनी प्रभु स्वयंभू सित छावनी है।

मुख भरे ब्रह्माण्ड खेले अंग माटी में लपेटे।
देख मैया रोष सहमे विहस आँचल ओढ़ लेटे।
झाँपते मुख केश कुंचित चन्द्र पर ज्यों घन घने हों।
बोल बोले तोतले झरते कमल मंजरि सने हों।
जीवनी स्यंदन प्रवेता सिन्धु तरणी लावनी है।

गोप गोपी संग नटखट केलि यमुना तीर साजे।
राधिका धुन सप्त स्वर में वियोगी रस वेणु बाजे।
मदन लज्जित हैं सहस्रों श्याम कमली पीत कटि पट।
मोरपाखी शीश शोभित सिद्ध योगी यमुन रज तट।
कृष्ण छलिया जग नियंता भव्य गीता स्रावनी है।
निर्गुणी प्रगटे चतुर्भुज योगमाया पावनी है।
*** सुधा अहलुवालिया
रथ / स्यंदन प्रवेता / सारथी

Sunday, 30 August 2026

शुभ-मंगल

 

चंदन चर्चित गात सुवासित मंगल शुभम् प्रभात।
नेह सनेही वात अवतरित, शोभित धवल प्रपात।।

भोर निरंतर अन्वेषण में, उदित क्षितिज अभिप्रेत।
ओस रश्मि के आवर्तन में, मोती निर्मल श्वेत।।

स्वतः स्फुरित स्पंदन नीरव-सम, नियमित नृत्य निनाद।
श्रृंगारित सी शस्य स्यामला, स्वाति संग संवाद।।

अनगढ़ महलों के वातायन, शीतल शांत समीर।
खग बैठे चहके अकुलाये, सर सरिता के तीर।।

ऐसे में तू मद अलसायी, करती निलय प्रवेश।
रोम-रोम खिल जाये तन का, दिवस बने अवशेष।।

*** रमेश उपाध्याय

Sunday, 23 August 2026

नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल - एक गीत

 

नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।
करुण हृदय हो सहज वेदना, थाती ये अनमोल।

ओढ़ आवरण जन्म-मृत्यु का,
राजा हो या भृत्य।
उजले तन का मान करे मन,
कहते जिसे अनित्य।
अपना-अपना कहकर हम-सब, बड़े न बोलें बोल।
नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।

पंचतत्व से निर्मित काया,
नेति-नेति से नेत।
सत्य सनातन संस्कृति कहती,
भाव भरे समवेत।
दुहराता इतिहास स्वयं ही, दुनिया अपनी गोल।
नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।

धर्म-कर्म से इसे सँवारें,
दाता का उपमान।
रोग-दोष से रक्षित प्रतिपल,
ऊर्जा भर दे प्राण।
'लता' प्रेम के बंधन में नित, मृदुता देती घोल।
नश्वर काया श्वास भरे जो, मिली हमें है तोल।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 16 August 2026

देह सिर्फ हाड़-मांस है - एक रचना

 

देह
सिर्फ हाड़-मांस
की आकृति नहीं यह उन तमाम स्पर्शों की स्मृति है
जिन्हें समय ने हमारी त्वचा पर लिख दिया है
कहते हैं देह के भीतर
एक पूरा संसार सांस लेता है
प्रेम/पीड़ा/भूख/प्यास
और तमाम इच्छाएँ
कभी यह माँ की गोद में सुरक्षित आकाश है
क भी प्रेम के स्पर्श से खिलउठती है
तो कभी समाज की निगाहों में सिर्फ एक वस्तु बन जाती है
चेहरे की झुर्रियाँ
समय की हार नहीं
जीए हुए जीवन की
अनकही पंक्तियाँ हैं
देह थकती है/टूटती है
फिर भी उसके भीतर
जीने की इच्छा
अंतिम क्षण तक रहती है
हम देह को अपना कहते हैं
फिर भी उसके अधिकार
दूसरों को सौंप देते हैं
पर सच तो यह है कि यह
न बाजार की वस्तु है
न आईने का प्रतिबिंब
बस यह तो मिट्टी की बनी है और
इसी में दफ़न हो जाएगी लेकिन
जाते-जाते एक बात कह जाएगी
देह का सम्मान दरअसल
जीवन का सम्मान है
*** राजेश कुमार सिन्हा
 

Sunday, 9 August 2026

लक्ष्य अपना है पाना - गीत

 

डर कर आँधी तूफ़ानों से, कहीं राह में रुक मत जाना।
जीवन के झंझावातों से, उबर लक्ष्य अपना है पाना॥

मौसम नित्य बदलते साथी, सुख-दुख भी हैं आते-जाते,
राह पकड़ जो एक चलें वो, अपनी मंजिल निश्चित पाते।
दृढ़ निश्चय के आगे गिरि भी, अपना उन्नत शीश झुकाते,
तप्त हवाओं से व्याकुल मरु, भू पर सुन्दर फूल खिलाते॥

मिले सफलता उसको जिसने, संघर्षों से हार न माना।
जीवन के झंझावातों से, उबर लक्ष्य अपना है पाना॥1॥

कहीं बाढ़ तूफ़ान कहीं है, अन्तस् उठा उफान कहीं है।
झंझावात हृदय के अन्दर, जीवन लहू-लुहान कहीं है॥
कहीं प्रलय सी बरखा बरसी, हृदय हिलोर उठान कहीं है।
तूफ़ानों में दीप जल रहा, जीवन का अवसान कहीं है॥

बाहर-भीतर की झंझा से, निकलेंगे मन में है ठाना।
जीवन के झंझावातों से, उबर लक्ष्य अपना है पाना॥2॥

विपदा में कुछ उजड़ गये घर, लेकिन साथी! हार न मानो।
मीत हृदय के बिछड़ गये यदि, इस दुनिया को अपना जानो॥
कर्म करो नवसृजन करो तुम, नये वितान यहाँ फिर तानो।
प्रकृति नटी के खेल अजब हैं, उसकी शक्ति सदा पहचानो॥

ईश्वर ने मानव-जीवन का, बुना अजब है ताना-बाना।
जीवन के झंझावातों से, उबर लक्ष्य अपना है पाना॥3॥

***कुन्तल श्रीवास्तव

"गणेश चतुर्थी पर विशेष आयोजन" - लीला छन्द पर आधारित गीत

  मूषक पर हो सवार, आये प्रथमेश द्वार...! सखि! मंगल-ध्वनि उचार, चलो करें द्वारचार॥ गौरी-शिव सुत गणेश, शीश शशि कुंचित केश। ऋद्धि-सिद्धि-...