Sunday, 12 July 2026

शब्द ज्ञान - एक गीत

 

शब्द से संसार रचना की कभी भगवान ने।
'तप' सुना 'तप' ही किया फिर एक तेरे ध्यान ने।।

शब्द से ही प्रेम होता शब्द से ही ग्लानियाँ।
भावना साकार होती इनसे ही गहराइयाँ।।
व्याल का विष शब्द सुनकर झट उतर जाता सुनो।
शब्द हो यदि मंत्र तो फिर विश्व तर जाता सुनो।।
यह अमी है पान करके हो अमर मानव यहाँ।
नाम से नामी प्रकट कर शब्द से है सब जहाँ।।
शब्द को मत भूलना तुम सीख दी नादान ने।।

राम हो या कृष्ण प्यारे शब्द से ही ज्ञात है।
शब्द में तन मन समाया शब्द सबके साथ है।।
शब्द सागर में समाया कवि हमारा प्यार से।
चुन लिए हीरे जगत में शब्द के ही सार से।।
ग्रंथ में जो भी लिखा है शब्द का ही भार है।
इस धरा से नभ तलक सब शब्द का व्यापार है।।
पंच भूतों को जनाया शब्द के ही ज्ञान ने।।

लेखनी लिखती फ़लक पर शब्द को अरमान से।
पात्र में जो शब्द सागर है मिला भगवान से।।
शब्द आँसू है ख़ुशी है शब्द से ही प्यार है।
इस धरा पर एक केवल शब्द ही तो सार है।।
एक क्षण मिलना बिछुड़ना एक क्षण में काल है।
जानता है शब्द से कवि जग यहाँ कंगाल है।।
शब्द मिटता है नहीं सुन कह दिया श्मशान ने।।
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राहुल शर्मा 'सिंधु'
फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश

Sunday, 5 July 2026

नेह भरा ईश्वर का प्यार

 

सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार ।
जीवन दर्शन जो भी समझे, कुदरत का माने उपकार ।।

माँ बापू ही ईश हमारे, नित उठ उनको करे प्रणाम।
करे ईश भी आदर इनका, इसके मिलते बहुत प्रमाण।।
पाल-पोष कर योग्य बनाते, जीवन में भरते उल्लास।
गुरुओं की बलिहारी माने, मिलती उनसे सीख अपार।।

गुरुवर ही वट वृक्ष बनाते, करे हृदय से हम सत्कार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

पृथ्वी माता, सूर्य चन्द्रमा, इन सबमें ईश्वर का रूप।
नदियाँ पर्वत वृक्ष सभी से, मिलते हैं उपहार अनूप।।
सत्य सनातन पथ पर चलते, ईश्वर पर करते विश्वास।
सद्कर्मों पर चलकर प्राणी, करे स्वयं का ही उद्धार।।

बने ईश का प्रेम दीवाना, मन मंदिर का हो शृंगार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

आस्था रखते सदा ईश पर, उनके नहीं दिलों में खोट।
कर्म मनुज का हो मर्यादित, नहीं किसी को देते चोट।।
अंतर्मन के वस्त्र उधेड़े, मन में उनके भरा विकार।
समय चक्र को समझे जो भी, हुआ उसी का बेड़ा पार।।

प्रीत पगे नयनों में छलके, नेह भरा ईश्वर का प्यार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'



Sunday, 28 June 2026

उमड़-घुमड़ घन - कुण्डलिया

 

उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर।
छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर।
पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी।
करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भारी।
करतीं बूँदें नृत्य, बजातीं घुँघरू छन-छन।
दामिनि दुल्हन संग, चले हैं उमड़-घुमड़ घन।

मनहारी काली घटा, रजनी भरती पीग।
झिलमिल तारों से भरी, साड़ी लिपटी भीग।
साड़ी लिपटी भीग, सितारे गिरे धरा पर।
लगता मुक्ता-हार, फेंक छिप गया कलाधर।
गाएँ झींगुर गीत, हो रही वर्षा भारी।
नाचें दादुर मोर, दृश्य अद्भुत मनहारी।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 21 June 2026

बात फूलों की - एक ग़ज़ल

 

प्यार की बात - बात फूलों की
किसने पूछी है जात फूलों की

दूर इंसान से हुआ इंसां
हर इबादत हयात फूलों की

दिन में महके हैं रात में महके
खिलखिलाती जमात फूलों की

इश्क़ काँटे समेटने आया
जा चुकी जब बरात फूलों की

ग़म-ए-दुनिया है ग़म का साया भी
कौन भूला है रात फूलों की

वक़्त मरहम लगा के छोड़ गया
ज़ख्म लिखते हैं घात फूलों की

छेद देता है होंठ से लकड़ी
कैद भँवरा है मात फूलों की
~~~~~~~~~~~
मदन मोहन शर्मा

Sunday, 14 June 2026

किसान

 

किसान
एक ऐसा मेहनती शख्स
जो बोता है उम्मीद सींचता है विश्वास
और काटता है संघर्ष
उसके हाथों की दरारों में
मौसमों का इतिहास लिखा होता है
उसके माथे पर चमकता पसीना
यूनिवर्सिटी की डिग्री से कम नहीं होता
वह हमेशा जागता रहता है
ओस की नमी और अंधेरे की चुप्पी के बीच
बादल उसके लिए कविता नहीं बल्कि
भाग्य का प्रश्न होते हैं और
बारिश उसके लिए रोमांस नहीं
रोटी का जुगाड़ होती है /है ना
कितनी अजीब बात जिसके हाथ
पूरे देश का पेट भरते हैं/अक्सर उसी
की थाली अधूरी रह जाती है
सूखा, बाढ़, कर्ज़ और बाज़ार
उसकी परीक्षा लेते हैं
फिर भी वह हार नहीं मानता
क्योंकि वह जानता है कि
जीवन का अर्थ संग्रह में नहीं
बेशक सृजन में है और किसान वह है
जो मिट्टी से सोना नहीं बनाता
बल्कि मिट्टी से जीवन बनाता है
जब भी किसी घर में
रोटी की खुशबू आती है
तब कहीं न कहीं
एक किसान का श्रम
मौन होकर मुस्कुराता है
पर एक सच तो यह भी है कि
धरती का सबसे उपेक्षित और निरीह
प्राणी किसान ही तो होता है
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***राजेश कुमार सिन्हा

Sunday, 7 June 2026

कहानी अग्नि की

 

'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।
यदि सृजन का मंत्र है यह, तो प्रलय की भी निशानी।

यज्ञ में हो प्रज्ज्वलित यह, देवता का भाग लेती।
शीत से व्याकुल धरा को, उष्णता का दान देती।
दीप बनकर पथ दिखाती, विश्व को यह ज्योति दानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

जब तपोबल बन धधकती, लक्ष्य कब रहता प्रतीक्षित।
चढ़ शिखर पुरुषार्थ के हों, प्राप्य सारे ही अभीप्सित।
किन्तु अनियंत्रित हुई तो, भस्म कर देती जवानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।

क्रोध बनकर यदि भड़कती, तोड़ देती नेह बन्धन।
नष्ट होती सभ्यताओं, की बनी है मूक क्रन्दन।
बोल हो संयम सधे यदि, प्रेम की गंगा बहानी।
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 31 May 2026

जीवन का यह मंच - दोहे

 

अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार।
जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार।।

यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक।
कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द अतिरेक।।

निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच।
पर्दा गिरते ही मिटें, झूठे सभी प्रपंच।।

आदि-अन्त के मध्य को, मंच करे साकार।
इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार।।

आया जो इस मंच पर, गूँजे उसका नाम।
हुआ अँधेरा बोलता, किरदारों का काम।।

करे उजागर मंच पर, सच को हर किरदार।
हरदम होती अंत में, सदा झूठ की हार।।

मंच आइना वक्त का, जिसमें जीवन काल।
विधिना के इस चक्र का, अम्बर बड़ा विशाल।।

*** सुशील सरना

शब्द ज्ञान - एक गीत

  शब्द से संसार रचना की कभी भगवान ने। 'तप' सुना 'तप' ही किया फिर एक तेरे ध्यान ने।। शब्द से ही प्रेम होता शब्द से ही ग्लानिय...