Sunday, 1 February 2026

प्रेम ही मोक्ष है - एक गीत

 

प्रेम ही प्राण है प्रेम ही श्वास है प्रेम पर ही टिका ये धरा ये गगन।

प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम से जीव है प्रेम से है जगत प्रेम से ईश है प्रेम से भक्ति है।
प्रेम ही भुक्ति है प्रेम ही मुक्ति है प्रेम कैवल्य है प्रेम ही शक्ति है।
प्रेम ही वंदना प्रेम ही अर्चना प्रेम अद्वैत है प्रेम ही है मिलन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम ही प्यास है प्रेम ही तृप्ति है प्रेम ही भावना का अगम सिंधु है,
प्रेम से आचमन मन हमेशा करे प्रेम ही भाव का उच्चतम बिंदु है।
प्रेम के पान से प्रेम के मान से मिट सकेगी हृदय की अमिट यह तपन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

प्रेम ही धर्म है प्रेम ही कर्म है प्रेम की रागनी गा रहे ग्रंथ हैं
प्रेम ही सार है इस सकल सृष्टि का प्रेम से ही सजे भाव मय पंथ हैं।
बाँध सकता बताओ भला प्रेम को कामना से भरा यह अधूरा बदन।
प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

एक गीत - यह महा-श्मशान है

 

घाट है मणिकर्णिका यह, रुद्र का वरदान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥

मंत्र दें तारक यहाँ शिव, हर मृतक के कान में।
मोक्ष का खुल द्वार जाता, मरघट के वितान में।
मंत्र शिव का मृतक के हित, मोक्ष का वरदान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥1॥

विविध रूपों में अघोरी, अर्द्ध रात्रि मसान में।
साधना शक्ति की करते, वाम मार्ग विधान में।
भूत-प्रेत-निशाचरों का, मसान एक छान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥2॥

घाट पर गंगा के हरपल, आ रहे हैं शव नये।
शवदाह करने अग्नि ले, 'कर' चुका परिजन गये।
डोम राजा का यहाँ पर, नृप सदृश् सम्मान है।
दिन-रात जलती है चिता, यहाँ महा-श्मशान है॥3॥

*** कुन्तल श्रीवास्तव

Sunday, 18 January 2026

आरम्भ

 

आरम्भ कोई शोर नहीं करता

वह अक्सर एक

गहरी चुप्पी में जन्म लेता है

जैसे रात के खत्म होने पर

अँधेरे को इत्तिला दिए बिना ही

सुबह की किरणें आ जाती हैं

आरम्भ बीते हुए का खंडन नहीं

बल्कि उसे सहलाती हुई

एक नई स्वीकृति है

मानों टूटे भरोसों की राख में

कहीं दबा हुआ

एक जीवित बीज!

आरम्भ

साहस से पहले का भय है

और भय के बाद की

सामान्य होती सांसे

यह वही क्षण है

जब मन

हार को स्वीकार कर

आगे बढ़ने का

पहला कदम रखता है!

आरम्भ

अंत का विरोध नहीं

उसका सबसे सटीक उत्तर है!


*** राजेश कुमार सिन्हा

 


Saturday, 10 January 2026

तब बनते हैं शंकर - गीत

 

निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।
विष का प्याला पीना पड़ता, तब बनते हैं शंकर।।
करे समाहित उदिध सभी को, सरिता जो भी आई।
हृदय-सिंधु में कहाँ मनुज के, सागर सी गहराई।।
सदा विश्व कल्याण भावना, नहीं भरे अभ्यंतर।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
ताकतवर निज कोष लुटाता, विश्व-धरा हरसाने।
मानव नित सामान जुटाता, लोगों को तड़पाने।।
किसी अहिल्या लाज लूटने, बनता नित्य पुरंदर।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
तृषित धरा की प्यास बुझाने, वास्पित हुआ हमेशा।
सुख-दुख में समभाव रखे नित, देता यही सँदेशा।।
मनुज स्वार्थ की पूर्ति हेतु ही, रहता लगा निरंतर।।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
*** चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

Sunday, 4 January 2026

नववर्ष पर दोहा सप्तक

 

खुशियों से भरपूर हो, नवल धवल हर भोर।
नव सुख की नव वर्ष में, बढ़ती जाए डोर।।1।।

मंगलमय नव वर्ष हो, हर पल हो खुशहाल।
प्रीत बढ़े नफरत मिटे, हर्ष भरा हो साल।।2।।

आगत का स्वागत करें, बढ़ें विगत को छोड़।
मची नये संकल्प की, नये साल में होड़।।3।।

मंथन बीते वर्ष पर, करना है बेकार।
नयी सोच से कीजिए, कल का नव शृंगार।।4।।

बिसरा बीती बात को, नूतन कर संकल्प।
श्रम से नव निर्माण का, कोई नहीं विकल्प।।5।।

नये साल की भोर का, सुखद सुहाना रूप।
फैले नूतन वर्ष में, हर पल सुख की धूप।।6।।

नया वर्ष सबका हरे, जीवन से संताप।
खुशहाली से ही सदा, होते बन्द प्रलाप।।7।।

*** सुशील सरना

Saturday, 27 December 2025

सूरज का संदेश

 

बेसुध करती रात सयानी, नित्य सँवारे रवि-स्यंदन है।
हार न जाना कर्म पथिक तुम, सुख-दुख सत्य चिरंतन है।

मत घबराना देख त्रासदी, उम्मीदों से जोड़ो नाता।
दर्द हमें अपनाना होगा, मधुर उमंगे भर दे दाता।
दिशा मनोहर प्राची कहती, आओ मेरा आलिंगन है।
बेसुध करती रात सयानी, नित्य सँवारे रवि-स्यंदन है।

मौन नहीं दीर्घा सपनों की, साँझ सँवारे नित कोलाहल।
यादों के संचित वैभव को, खोल रहा है मन ये चंचल।
नहीं निराशा कुछ भी देती, करना हमको नित मंथन है।
बेसुध करती रात सयानी, नित्य सँवारे रवि-स्यंदन है।

अस्थिरता की बेड़ी पग में, घूम रहा है धुंध निरंतर।
पीड़ा पैठ गयी पलकों में उसे सँजोये रत अभ्यंतर।
बाँध रही श्वांसों के बंधन, ”लता” जगाये उर धड़कन है।
बेसुध करती रात सयानी, नित्य सँवारे रवि-स्यंदन है।
*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 21 December 2025

धुंध ने डाला डेरा - एक गीत

 

ठिठुर रही है सृष्टि हमारी, छाया हुआ अँधेरा।
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥

हिम-कण बनकर शूल बरसते, मौन हुई है वाणी।
नदी-सरोवर बर्फ बन रहे, विकल हुआ है पानी।
सन्नाटे ने कसकर जकड़ा, दुःखों ने मुँह न फेरा॥
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥

महलों में तो शाल-दुशाले, वे सुख-नींद मगन हैं॥
निर्धन की कुटिया में देखो, कैसे बीत रहे क्षण हैं।
फुटपाथों पर सिसक रहा है, जिसका रैन-बसेरा॥
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥

नश्वर है यह काल-खण्ड भी, धीरज तुम मत खोना।
ऋतुओं का यह चक्र चल रहा, चकित नहीं तुम होना।
लौटेंगी स्वर्णिम किरणें फिर, होगा नया सवेरा॥
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥

*** आचार्य प्रताप 

प्रेम ही मोक्ष है - एक गीत

  प्रेम ही प्राण है प्रेम ही श्वास है प्रेम पर ही टिका ये धरा ये गगन। प्रेम ही शांति है प्रेम ही मोक्ष है प्रेम को ही हृदय कर रहा है नमन। प्...