देह
सिर्फ हाड़-मांस
की आकृति नहीं यह उन तमाम स्पर्शों की स्मृति है
जिन्हें समय ने हमारी त्वचा पर लिख दिया है
कहते हैं देह के भीतर
एक पूरा संसार सांस लेता है
प्रेम/पीड़ा/भूख/प्यास
और तमाम इच्छाएँ
कभी यह माँ की गोद में सुरक्षित आकाश है
क भी प्रेम के स्पर्श से खिलउठती है
तो कभी समाज की निगाहों में सिर्फ एक वस्तु बन जाती है
चेहरे की झुर्रियाँ
समय की हार नहीं
जीए हुए जीवन की
अनकही पंक्तियाँ हैं
देह थकती है/टूटती है
फिर भी उसके भीतर
जीने की इच्छा
अंतिम क्षण तक रहती है
हम देह को अपना कहते हैं
फिर भी उसके अधिकार
दूसरों को सौंप देते हैं
पर सच तो यह है कि यह
न बाजार की वस्तु है
न आईने का प्रतिबिंब
बस यह तो मिट्टी की बनी है और
इसी में दफ़न हो जाएगी लेकिन
जाते-जाते एक बात कह जाएगी
देह का सम्मान दरअसल
जीवन का सम्मान है
*** राजेश कुमार सिन्हा






