Sunday, 1 November 2026

विवश पड़ी फाँसी की रस्सी - एक गीत

 


विवश पड़ी फाँसी की रस्सी, चुप-चुप आँसू पीती है।
लील गई सुत भारत माँ के, शापित जीवन जीती है।

 

व्यथा सुनाए खोल हृदय को, आँखों से आंँसू बहते।
लाल अनेकों हँस कर झूले, भारत की जय-जय कहते।
बोली उस दिन प्रति पल प्रति क्षण, मौत उसी पर बीती है।
लील गई सुत भारत माँ….

 

कौन घड़ी में भाग्य विधाता, तुमने मेरा भाग्य गढ़ा।
रेशम से सौ रिश्ते जोड़े, सिर पर मेरे त्याज्य मढ़ा।
जीर्ण-शीर्ण भावों की चादर, आखर-आखर सीती है।
लील गई सुत भारत माँ ….

 

कुछ कलंक धोया कर्मों का, जब आतंकी को पकड़ा।
तृण-तृण में संचित शक्ति से, खल की ग्रीवा को जकड़ा।
श्रद्धा अर्पण उस माता को, जिसकी गागर रीती है।
लील गई सुत भारत माँ….

*** अर्चना सिंह 'अना' 

Sunday, 25 October 2026

जय बोलें प्रकाश की - एक गीत

 

चलो तिमिर चीरें जय बोलें, प्रकाश की।
पुनः पराजय हो जीवन के, कुहास की।

उदित हुए नव रवि को देखें।
जाते हुए तमस को लेखें।
अगणित बीज लगे जीवन में।
पुष्प प्रस्फुटित हों उपवन में।
नीरवता हो भङ्ग आस है, सुभाष की।
चलो तिमिर चीरें जय बोलें, प्रकाश की।

हो पुष्पित पल्लवित सु-आशा।
गमन हृदय से करे निराशा।
सम्भव सब है कमी नहीं है।
गति जीवन की थमी नहीं है।
मरु-थल में भी फसल उगायें, सुहास की।
चलो तिमिर चीरें जय बोलें, प्रकाश की।

अभी बहुत कुछ हमको करना।
सूरज बनकर जलते रहना।
यही हमें आगे ले जातीं।
एक-एक सोपान चढ़ातीं।
नहीं हमें अब शरण चाहिए , हताश की।
चलो तिमिर चीरें जय बोलें, प्रकाश की।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 18 October 2026

हे माँ दुर्गे!

 

हे माँ दुर्गे!
तुम जगत जननी हो
असुरों का संहार करती हो
पर माँ/मनुष्य के भीतर पलते असुरों का क्या?
वे असुर/ जो तुम्हारे मंदिर में शीश झुकाते हैं
और बाहर मनुष्यता का गला घोंट देते हैं
हे माँ! अब तुम्हें आकाश से उतरने की नहीं
हमारे भीतर जागने की आवश्यकता है
हमारे साहस में/हमारे विवेक में/
अन्याय के विरुद्ध उठती आवाज़ में
मुझे वरदान नहीं/सत्य के लिए
खड़े होने का साहस देना माँ
जब तुम विदा होना विजय दशमी को
तो अपने साथ ले जाना हमारे
भीतर का भय और अहंकार/और छोड़ जाना
हर हृदय में थोड़ी-सी दुर्गा
ताकि तुम्हारी सच्ची विजय मंदिरों में नहीं
मनुष्य के चरित्र में दिखाई दे
हे माँ दुर्गे/ मुझे तुम्हारी प्रतिमा नहीं
अपने भीतर की दुर्गा जगानी है
जो मुझे इतनी शक्ति दे कि मैं
खड़ा हो सकूँ/अन्याय के विरुद्ध
चुनौती दे सकूँ अधर्मी को
बस इतनी ही इल्तजा है माते
मेरी करुण पुकार सुन लेना
*** राजेश कुमार सिन्हा

Sunday, 11 October 2026

प्रेम बिना सब सूना - एक गीत

 

प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।
प्रेम बिना सब रिश्ते बन्धन, लगता जीवन खार।

भाव-भूमि का मधुरिम अंकन, रचता नव आह्लाद।
प्रेम-प्रकाश परावर्तित हो, देता दीप्ति प्रसाद।
जड़-चेतन अवनी अम्बर का, प्रेम बना आधार।
प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।

पारावार प्रेम का शाश्वत, अनुपम और अगम्य।
प्रेम सच्चिदानन्द रूप है, पावन और प्रणम्य।
प्रेम-प्रभा से जगमग रहता, यह व्यापक संसार।
प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।

प्रेम-सुधा से तृप्त हृदय हो, मिटे सकल संताप।
प्रेम जगाता है प्राणों में, करुणा का आलाप।
दीप जलाए आत्म-प्रभा का, प्रेम करे उद्धार।
प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 4 October 2026

तमस हटाता नित्य सवेरा - गीत

 

जीवन के इस महा समर में, सुख-दुख ने मानव को घेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।

 

पतझड़ का मौसम जाने पर, बासंती मौसम भी आता।
शूल बिछी जब राह पार हो, सुगम राह पर पाँव बढ़ाता।।
होगा ही अनुकूल समय पर, कभी मनुज के पग का फेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, त मस हटाता नित्य सवेरा।।

 

वक्त एक सा कभी न रहता, बुरा समय भी टल ही जाता।
लोभ-मोह से बंधन तोड़ें, मैल दिलों से तब मिट पाता।।
हटी नहीं यदि धुन्ध हृदय से, तभी घेरता रहें अँधेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।

 

शीत काँपता देख कृषक को, आतप ठंडा पड़ जाता है।
ओलों की चोटों को सहकर, लिए फावड़ा वह आता है।।
अंत भला तो सब भला कहे, नए रंग मन भरें चितेरा।
नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।

 

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

Sunday, 27 September 2026

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

 

उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल।
उड़ते पाखी दल से खेले, पवन बावरा चंचल।
सूखे तरुवर हरित शाख से, करतल ताल-बजाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

बिजुरी कौंधी रेखांकित से, जगमग धरती रानी।
गीत प्रीत के गाती जाए, ओढ़े चूनर धानी।
इन्द्रधनुष की आभा लेकर, किरणों के दल आए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

बुध-बुध खोकर प्रीतम प्यारा, भीगा मन्मथ डोले।
कली गली में गुंजित सरगम, मधुकर मदिरा घोले।
आशाओं का मधुबन फिर से, अनहद प्यास-बुझाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

विवश पड़ी फाँसी की रस्सी - एक गीत

  विवश पड़ी फाँसी की रस्सी, चुप-चुप आँसू पीती है। लील गई सुत भारत माँ के, शापित जीवन जीती है।   व्यथा सुनाए खोल हृदय को, आँखों से आंँसू बहते...