Sunday, 3 May 2026

सरतीति संसार: - एक गीत

 

यह माटी है यह सोना है, सुख-दुख का भण्डार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।
मेला लगा कहीं भक्तों का, संगम तट पर वास है,
कहीं नशे में चूर जवानी, जलती गीली घास है,
विश्वासों के बिछे गलीचे, छल-छद्मों का जाल है,
उगल रहे विष साॅंप दूध पी, दन्त गढ़ाते भाल है।

फूलों की घाटी के नीचे, दहक रहे अंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।

शांति - प्रेम - सद्भाव यहीं है, विश्व ग्राम का भाव भी,
मतभेदों के बीच उभरता, नव रिश्तों का चाव भी,
है आतंक - युद्ध -शोषण तो, मानवता का गान भी,
समृद्धि ने संस्कृति को बाँटें, गुप्त घाव का भान भी।

कहीं ज्ञान का विद्रुप मुख है, कहीं ज्ञान शृंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।

शाश्वत भी है मिथ्या भी है, व्यष्टि- समष्टि रूप यही,
क्षणभंगुर में नित जीवन है, वही कृषक है कृषि वही,
वही जगत के नाट्य मंच का, अभिनेता- निर्देशक है,
मनुज पीर का कुशल चितेरा, हँसता हुआ विदूषक है।

समझो तो जग ही ईश्वर है, ना मानो भंगार है।
जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।।
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*** मदन मोहन शर्मा

सरतीति संसार: - एक गीत

  यह माटी है यह सोना है, सुख-दुख का भण्डार है। जिसने इसको जैसा देखा, वैसा यह संसार है।। मेला लगा कहीं भक्तों का, संगम तट पर वास है, कहीं...