Sunday, 28 June 2026

उमड़-घुमड़ घन - कुण्डलिया

 

उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर।
छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर।
पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी।
करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भारी।
करतीं बूँदें नृत्य, बजातीं घुँघरू छन-छन।
दामिनि दुल्हन संग, चले हैं उमड़-घुमड़ घन।

मनहारी काली घटा, रजनी भरती पीग।
झिलमिल तारों से भरी, साड़ी लिपटी भीग।
साड़ी लिपटी भीग, सितारे गिरे धरा पर।
लगता मुक्ता-हार, फेंक छिप गया कलाधर।
गाएँ झींगुर गीत, हो रही वर्षा भारी।
नाचें दादुर मोर, दृश्य अद्भुत मनहारी।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 21 June 2026

बात फूलों की - एक ग़ज़ल

 

प्यार की बात - बात फूलों की
किसने पूछी है जात फूलों की

दूर इंसान से हुआ इंसां
हर इबादत हयात फूलों की

दिन में महके हैं रात में महके
खिलखिलाती जमात फूलों की

इश्क़ काँटे समेटने आया
जा चुकी जब बरात फूलों की

ग़म-ए-दुनिया है ग़म का साया भी
कौन भूला है रात फूलों की

वक़्त मरहम लगा के छोड़ गया
ज़ख्म लिखते हैं घात फूलों की

छेद देता है होंठ से लकड़ी
कैद भँवरा है मात फूलों की
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मदन मोहन शर्मा

Sunday, 14 June 2026

किसान

 

किसान
एक ऐसा मेहनती शख्स
जो बोता है उम्मीद सींचता है विश्वास
और काटता है संघर्ष
उसके हाथों की दरारों में
मौसमों का इतिहास लिखा होता है
उसके माथे पर चमकता पसीना
यूनिवर्सिटी की डिग्री से कम नहीं होता
वह हमेशा जागता रहता है
ओस की नमी और अंधेरे की चुप्पी के बीच
बादल उसके लिए कविता नहीं बल्कि
भाग्य का प्रश्न होते हैं और
बारिश उसके लिए रोमांस नहीं
रोटी का जुगाड़ होती है /है ना
कितनी अजीब बात जिसके हाथ
पूरे देश का पेट भरते हैं/अक्सर उसी
की थाली अधूरी रह जाती है
सूखा, बाढ़, कर्ज़ और बाज़ार
उसकी परीक्षा लेते हैं
फिर भी वह हार नहीं मानता
क्योंकि वह जानता है कि
जीवन का अर्थ संग्रह में नहीं
बेशक सृजन में है और किसान वह है
जो मिट्टी से सोना नहीं बनाता
बल्कि मिट्टी से जीवन बनाता है
जब भी किसी घर में
रोटी की खुशबू आती है
तब कहीं न कहीं
एक किसान का श्रम
मौन होकर मुस्कुराता है
पर एक सच तो यह भी है कि
धरती का सबसे उपेक्षित और निरीह
प्राणी किसान ही तो होता है
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***राजेश कुमार सिन्हा

Sunday, 7 June 2026

कहानी अग्नि की

 

'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।
यदि सृजन का मंत्र है यह, तो प्रलय की भी निशानी।

यज्ञ में हो प्रज्ज्वलित यह, देवता का भाग लेती।
शीत से व्याकुल धरा को, उष्णता का दान देती।
दीप बनकर पथ दिखाती, विश्व को यह ज्योति दानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

जब तपोबल बन धधकती, लक्ष्य कब रहता प्रतीक्षित।
चढ़ शिखर पुरुषार्थ के हों, प्राप्य सारे ही अभीप्सित।
किन्तु अनियंत्रित हुई तो, भस्म कर देती जवानी,
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि' अवनति की कहानी।

क्रोध बनकर यदि भड़कती, तोड़ देती नेह बन्धन।
नष्ट होती सभ्यताओं, की बनी है मूक क्रन्दन।
बोल हो संयम सधे यदि, प्रेम की गंगा बहानी।
'अग्नि' उन्नति की कथा है, 'अग्नि'अवनति की कहानी।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

आशा की किरण - एक गीत

  आशा एक किरण छोटी सी, मन को ख़ुशियों से भर जाती। चिर-सन्तप्त हृदय में नेहिल, अपनेपन का लेप लगाती। भग्न मनोरथ के मरुथल में, सरिता बनकर बहती क...