Sunday, 21 June 2026

बात फूलों की - एक ग़ज़ल

 

प्यार की बात - बात फूलों की
किसने पूछी है जात फूलों की

दूर इंसान से हुआ इंसां
हर इबादत हयात फूलों की

दिन में महके हैं रात में महके
खिलखिलाती जमात फूलों की

इश्क़ काँटे समेटने आया
जा चुकी जब बरात फूलों की

ग़म-ए-दुनिया है ग़म का साया भी
कौन भूला है रात फूलों की

वक़्त मरहम लगा के छोड़ गया
ज़ख्म लिखते हैं घात फूलों की

छेद देता है होंठ से लकड़ी
कैद भँवरा है मात फूलों की
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मदन मोहन शर्मा

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