Sunday, 2 August 2026

गीत - करे सुगंधित मन आँगन को

 

शीतल मंद पवन के झोंके, आल्हादित करते हैं मन को।
पँछी सा स्वच्छंद हुआ मन, छूना चाहें मुक्त गगन को।।

प्रीति डगर चुन ली जिसने भी, उस पर ही अब चलना चाहे।
किन्तु स्वार्थ कीे बहे आँधियाँ, उसमें बहकर भरते आहे।।
आक्रोशित युवकों की ज्वाला, झुलसाती रहती है तन को।
शीतल मंद पवन के झोंके, आल्हादित करते हैं मन को।।

आँधी या तूफान जलजले, झेल रहे हैं हर आफ़त को।
हुई प्रदूषित हवा देश की, मिलकर चुनती है ताकत को।।
भावों की निर्मल सरिताएँ, करे सुगंधित मन आँगन को।
शीतल मंद पवन के झोंके, आल्हादित करते हैं मन को।।

अभी पवन में नमी शेष है, कभी न खोना नीर नयन का।
झरे जहाँ पर हँसी तराने, मधुवन उजड़े नहीं चमन का।।
पेड़ों की झुरमुट से बहती, हवा सुवासित लगे सजन को।
शीतल मंद पवन के झोंके, आल्हादित करते हैं मन को।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

1 comment:

  1. रचना पोस्ट करने के लिए हार्दिक आभार।

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गीत - करे सुगंधित मन आँगन को

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