सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार ।
जीवन दर्शन जो भी समझे, कुदरत का माने उपकार ।।
माँ बापू ही ईश हमारे, नित उठ उनको करे प्रणाम।
करे ईश भी आदर इनका, इसके मिलते बहुत प्रमाण।।
पाल-पोष कर योग्य बनाते, जीवन में भरते उल्लास।
गुरुओं की बलिहारी माने, मिलती उनसे सीख अपार।।
गुरुवर ही वट वृक्ष बनाते, करे हृदय से हम सत्कार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।
पृथ्वी माता, सूर्य चन्द्रमा, इन सबमें ईश्वर का रूप।
नदियाँ पर्वत वृक्ष सभी से, मिलते हैं उपहार अनूप।।
सत्य सनातन पथ पर चलते, ईश्वर पर करते विश्वास।
सद्कर्मों पर चलकर प्राणी, करे स्वयं का ही उद्धार।।
बने ईश का प्रेम दीवाना, मन मंदिर का हो शृंगार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।
आस्था रखते सदा ईश पर, उनके नहीं दिलों में खोट।
कर्म मनुज का हो मर्यादित, नहीं किसी को देते चोट।।
अंतर्मन के वस्त्र उधेड़े, मन में उनके भरा विकार।
समय चक्र को समझे जो भी, हुआ उसी का बेड़ा पार।।
प्रीत पगे नयनों में छलके, नेह भरा ईश्वर का प्यार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।
*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'
