Sunday, 26 July 2026

छात्र और शिक्षा - एक गीत

 

शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी से, अनुशासित परिवेश।
ज्ञान-धर्म पर वाद न कोई, जागरूक हो देश।

शिक्षा का उपयोग सही हो,
अभिलाषा यह मात्र।
जनमत की आवाज़ यही है,
भावी पीढ़ी छात्र।
चिंतनीय क्यों दशा आज है, मचा हुआ है क्लेश।
शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी से, अनुशासित परिवेश।

डिगे नहीं जो लक्ष्य-सत्य से,
पूर्ण करें तज स्वार्थ।
ध्यान साधना मार्ग अपरिमित,
ज्ञान सधे परमार्थ।
विष्णुगुप्त के मंत्र आज भी,बँधी शिखा हो केश।
शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी से, अनुशासित परिवेश।

कल की आशा छात्र हमारे,
व्यर्थ न उनका रोष।
प्रश्नपत्र के दीमक घाती,
किसका कितना दोष।
कहांँ जगाए भोर अर्चना, कहते सखा खगेश।
शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी से, अनुशासित परिवेश।

*** डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 19 July 2026

आशा की किरण - एक गीत

 

आशा एक किरण छोटी सी, मन को ख़ुशियों से भर जाती।
चिर-सन्तप्त हृदय में नेहिल, अपनेपन का लेप लगाती।

भग्न मनोरथ के मरुथल में, सरिता बनकर बहती कल-कल।
निष्प्रभ नयनों के आँगन में, भरती है प्रकाश नित जल-जल।
साहस का अनुभाव लिए मन, कण्टक पथ में चरण बढ़ाती।
दुर्गम जीवन-पथ में निशिदिन, दिव्य विजयवर्तिका जलाती।
चिर-सन्तप्त हृदय में नेहिल....

जब-जब अन्तर की वीणा पर, स्वर नैराश्य निनादित होते।
हम स्वप्नों का आँचल छूकर, आशा की सरगम में खोते।
जाग्रति भर दे मनाकाश में, ऐसा मनहर गीत सुनाती।
आशा की लघु ज्योति मनों में, नित नूतन आभा बिखराती।
चिर-सन्तप्त हृदय में नेहिल....

निशि के घोर तिमिर में बनकर, अरुणोदय सी यह मुस्काए।
मृत-जीवन अभिलाषाओं में, नव-नव स्पन्दन भर-भर जाए।
अन्धकार आच्छादित मन में, बनी दामिनी चमक जगाती।
अवसादित मन के कोने से, क्षण में सारा तमस मिटाती।
चिर-सन्तप्त हृदय में नेहिल....

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 12 July 2026

शब्द ज्ञान - एक गीत

 

शब्द से संसार रचना की कभी भगवान ने।
'तप' सुना 'तप' ही किया फिर एक तेरे ध्यान ने।।

शब्द से ही प्रेम होता शब्द से ही ग्लानियाँ।
भावना साकार होती इनसे ही गहराइयाँ।।
व्याल का विष शब्द सुनकर झट उतर जाता सुनो।
शब्द हो यदि मंत्र तो फिर विश्व तर जाता सुनो।।
यह अमी है पान करके हो अमर मानव यहाँ।
नाम से नामी प्रकट कर शब्द से है सब जहाँ।।
शब्द को मत भूलना तुम सीख दी नादान ने।।

राम हो या कृष्ण प्यारे शब्द से ही ज्ञात है।
शब्द में तन मन समाया शब्द सबके साथ है।।
शब्द सागर में समाया कवि हमारा प्यार से।
चुन लिए हीरे जगत में शब्द के ही सार से।।
ग्रंथ में जो भी लिखा है शब्द का ही भार है।
इस धरा से नभ तलक सब शब्द का व्यापार है।।
पंच भूतों को जनाया शब्द के ही ज्ञान ने।।

लेखनी लिखती फ़लक पर शब्द को अरमान से।
पात्र में जो शब्द सागर है मिला भगवान से।।
शब्द आँसू है ख़ुशी है शब्द से ही प्यार है।
इस धरा पर एक केवल शब्द ही तो सार है।।
एक क्षण मिलना बिछुड़ना एक क्षण में काल है।
जानता है शब्द से कवि जग यहाँ कंगाल है।।
शब्द मिटता है नहीं सुन कह दिया श्मशान ने।।
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राहुल शर्मा 'सिंधु'
फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश

Sunday, 5 July 2026

नेह भरा ईश्वर का प्यार

 

सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार ।
जीवन दर्शन जो भी समझे, कुदरत का माने उपकार ।।

माँ बापू ही ईश हमारे, नित उठ उनको करे प्रणाम।
करे ईश भी आदर इनका, इसके मिलते बहुत प्रमाण।।
पाल-पोष कर योग्य बनाते, जीवन में भरते उल्लास।
गुरुओं की बलिहारी माने, मिलती उनसे सीख अपार।।

गुरुवर ही वट वृक्ष बनाते, करे हृदय से हम सत्कार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

पृथ्वी माता, सूर्य चन्द्रमा, इन सबमें ईश्वर का रूप।
नदियाँ पर्वत वृक्ष सभी से, मिलते हैं उपहार अनूप।।
सत्य सनातन पथ पर चलते, ईश्वर पर करते विश्वास।
सद्कर्मों पर चलकर प्राणी, करे स्वयं का ही उद्धार।।

बने ईश का प्रेम दीवाना, मन मंदिर का हो शृंगार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

आस्था रखते सदा ईश पर, उनके नहीं दिलों में खोट।
कर्म मनुज का हो मर्यादित, नहीं किसी को देते चोट।।
अंतर्मन के वस्त्र उधेड़े, मन में उनके भरा विकार।
समय चक्र को समझे जो भी, हुआ उसी का बेड़ा पार।।

प्रीत पगे नयनों में छलके, नेह भरा ईश्वर का प्यार।
सृष्टि रचयिता परमेश्वर ही, जीवन पथ करते उजियार।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'



देह सिर्फ हाड़-मांस है - एक रचना

  देह सिर्फ हाड़-मांस की आकृति नहीं यह उन तमाम स्पर्शों की स्मृति है जिन्हें समय ने हमारी त्वचा पर लिख दिया है कहते हैं देह के भीतर एक पूरा ...