Sunday, 28 June 2026

उमड़-घुमड़ घन - कुण्डलिया

 

उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर।
छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर।
पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी।
करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भारी।
करतीं बूँदें नृत्य, बजातीं घुँघरू छन-छन।
दामिनि दुल्हन संग, चले हैं उमड़-घुमड़ घन।

मनहारी काली घटा, रजनी भरती पीग।
झिलमिल तारों से भरी, साड़ी लिपटी भीग।
साड़ी लिपटी भीग, सितारे गिरे धरा पर।
लगता मुक्ता-हार, फेंक छिप गया कलाधर।
गाएँ झींगुर गीत, हो रही वर्षा भारी।
नाचें दादुर मोर, दृश्य अद्भुत मनहारी।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

1 comment:

  1. सुंदर भावों की छंद द्वय। । हो रही वर्षा भारी/ मेह बरस रहा भारी ।

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