जीत लिया जिसने मन को वह वीर प्रवीर अधीर न होगा।
क्रोध प्रलोभन काम गुमान लिए मन मेल असीर न होगा।
सौम्य सुशील स्वभाव सुसज्जित और कहीं रणधीर न होगा।
भीतर धार लिया प्राण तो फिर और समान सुबीर न होगा।।
जोश जागे रणतूर्य सुने असि ताल बजा जयघोष करे वो।
मौत नहीं भयभीत करे तब कौन कहे किस बात डरे वो।
नाद अगाध करे मुख से ललकार सुना मन भीति भरे वो।
यूढ़ पलायन शत्रु करें रण में जब पाँव अडोल धरे वो।।
*** सूरजपाल सिंह, कुरुक्षेत्र

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