Sunday, 5 April 2015

चाँद



चंद्र व्योम
देहयष्टि
विचरते तत्वबोध को
तत्सम शशि
उतावला, जिज्ञासु
परिभ्रमण में परस करता,
कितने ही चंद्र
अचंभित है
स्व के
चन्द्र संबोधन पर,
पयोधर पश्य पाकर
पीन पयोन
पीत पट
प्रसारता
पाहुने का आत्मबोध,
अंक में अंकित किये
अधरों के अधर बिम्ब
नभ ने संवारदी
मानस की चित्रावली
चित्रसेन चित्रांगदा के च्यवनप्राशरस
अभिसारकर
अविष्कृत करता
निजरूप
चंद्रलेखा के चितराम पर।
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***गोविन्द हाँकला

Thursday, 2 April 2015

आ बैल मुझे मार

 
मूर्ख पत्नी।
कपटी यार।
आ बैल मुझे मार। 


चोरी चकारी।
लूट का व्यापार।
आ बैल मुझे मार। 


अंधा राजा।
बहरे कहार।
आ बैल मुझे मार। 


पराई नार।
दिल बेकरार।
आ बैल मुझे मार। 


कड़वे बोल।
बिना विचार।
आ बैल मुझे मार।


*** संजीव जैन:-

Sunday, 22 March 2015

जीवन





प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

सुन्दर विशाल भवन-सा स्वस्थ शरीर बनाया, 
पाँच उद्यान पाँच बाजार से तन को सजाया,  
पाँच कोट की काया, पाँच दोष से उढ़ाया,  
नाथ मेरे दूषित तन को शुद्ध करो,  
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

नौ द्वार भवन मध्य तीन खण्डों में बँटाया, 
हर द्वार हाथ पसारा प्रेम भिक्षा ले आया,  
राग-द्वेष की दीमक चाट रही चित घबराया,  
आन प्रभु अब मेरा चित्त शांत करो,  
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

पाँच माला सदन और एक रक्षक बैठाया, 
बना बैठा गृह स्वामिनी काहे दुःख सताया,  
मुक्त गगन में उड़ अंतस मध्य गोता लगाया,  
पिंजरा तोड़ कर पंछी उड़ान भरो, 
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

इंदु रचित पद सुन्दर ज्ञान भर अन्दर,  
कूट कर चेतस भाव मन अन्दर धरो । 
प्रभुजी मेरे तन साँस-साँस भ्रम हरो।। 

********* सुरेश चौधरी 

(रक्षक=प्राण, ९ द्वार = २ आँखें, २ नाक छिद्र, २ कान १ मुँह, १ गुदा, १ जनेन्द्रिय ३ खंड = त्रीगुण, सत-रज-तम, ६ परिवार = मन, दृष्टि, स्वाद, गंध, शब्द, स्पर्श ५ बाजार = ५ कर्मेन्द्रियाँ ५ तत्त्व = क्षिति, जल, गगन, पावक, समीर, १ गृहस्वामिनी= भौतिक सुख)

Monday, 16 March 2015

बाकी झलक अनोखेपन की




झलक रही छवि देख थके हम,
ललक भरे नैनन की;
बाकी झलक अनोखेपन की।
दारुण दाह लिए,
बिछोह की आह लिए;
चित्त कुछ अधीर है,
अकथ कोई पीर है;
नेत्र में न नीर है,
शिथिल ज्यों शरीर है;
कथा-व्यथा है मानो;
एक वियोगी जन की।
बाकी झलक अनोखेपन की।
कह न सकी कुछ,
सुन न सकी कुछ,
रही मूक हलचल सी;
प्रकृति संग भी
निपट अकेली;
पावन गंगाजल सी।
है ज्वालामुखी,
या उसकी चिंगारी;
मित्र कहो, है पुरुष;
या कह लो नारी!
रही प्रतीक्षा उभय दिशा से;
आलिंगन के क्षण की।
बाकी झलक अनोखेपन की।

*** हरिहर तिवारी ***

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...