Sunday, 13 September 2026

एक प्रेम प्रसंग - सार छंद

 

जीवन नभ पर खिला चाँद वह, दिन के थकते आए।
मन के सागर में डूबे फिर, भावों में उतराए।
कैसे उसे निहारूँ जी भर, कैसे प्यार जताऊँ।
लज्जा के बादल से उसको, कैसे बाहर लाऊँ।।

कहूँ प्रेमिका मन मन्दिर में, आकर दीप जलाओ।
मेरे मन की सुनों व्यथाएँ, कुछ अपनी कह जाओ।
श्वास डोर यह टूट रही है, विरह नहीं सह पाऊँ।
प्यारी कहीं अकारण देही, मैं अनंग हो जाऊँ।।

*** फणीन्द्र कुमार ‘भगत’ 

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