Sunday, 6 September 2026

श्री कृष्ण जन्माष्टमी - एक गीत

 

निर्गुणी प्रगटे चतुर्भुज योगमाया पावनी है।
दामिनी दमके सहस्रों यामिनी रस सावनी है।

अवतरण सोलह कलाओं में सजाई सगुण काया।
बाल छवि चंचल चपल चपला दमकती प्रकुल छाया।
वास कण कण में उसीका सजल करुणा सिन्धु छल-छल।
साँवरा मुख अंग शोभित अनवरत रसधार कल-कल।
रूप शुभ अनपायनी प्रभु स्वयंभू सित छावनी है।

मुख भरे ब्रह्माण्ड खेले अंग माटी में लपेटे।
देख मैया रोष सहमे विहस आँचल ओढ़ लेटे।
झाँपते मुख केश कुंचित चन्द्र पर ज्यों घन घने हों।
बोल बोले तोतले झरते कमल मंजरि सने हों।
जीवनी स्यंदन प्रवेता सिन्धु तरणी लावनी है।

गोप गोपी संग नटखट केलि यमुना तीर साजे।
राधिका धुन सप्त स्वर में वियोगी रस वेणु बाजे।
मदन लज्जित हैं सहस्रों श्याम कमली पीत कटि पट।
मोरपाखी शीश शोभित सिद्ध योगी यमुन रज तट।
कृष्ण छलिया जग नियंता भव्य गीता स्रावनी है।
निर्गुणी प्रगटे चतुर्भुज योगमाया पावनी है।
*** सुधा अहलुवालिया
रथ / स्यंदन प्रवेता / सारथी

No comments:

Post a Comment

श्री कृष्ण जन्माष्टमी - एक गीत

  निर्गुणी प्रगटे चतुर्भुज योगमाया पावनी है। दामिनी दमके सहस्रों यामिनी रस सावनी है। अवतरण सोलह कलाओं में सजाई सगुण काया। बाल छवि चंचल चपल च...