Sunday, 27 September 2026

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

 

उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल।
उड़ते पाखी दल से खेले, पवन बावरा चंचल।
सूखे तरुवर हरित शाख से, करतल ताल-बजाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

बिजुरी कौंधी रेखांकित से, जगमग धरती रानी।
गीत प्रीत के गाती जाए, ओढ़े चूनर धानी।
इन्द्रधनुष की आभा लेकर, किरणों के दल आए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

बुध-बुध खोकर प्रीतम प्यारा, भीगा मन्मथ डोले।
कली गली में गुंजित सरगम, मधुकर मदिरा घोले।
आशाओं का मधुबन फिर से, अनहद प्यास-बुझाए।
पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...