उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए।पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल।उड़ते पाखी दल से खेले, पवन बावरा चंचल।सूखे तरुवर हरित शाख से, करतल ताल-बजाए।पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।बिजुरी कौंधी रेखांकित से, जगमग धरती रानी।गीत प्रीत के गाती जाए, ओढ़े चूनर धानी।इन्द्रधनुष की आभा लेकर, किरणों के दल आए।पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।बुध-बुध खोकर प्रीतम प्यारा, भीगा मन्मथ डोले।कली गली में गुंजित सरगम, मधुकर मदिरा घोले।आशाओं का मधुबन फिर से, अनहद प्यास-बुझाए।पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए।*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

No comments:
Post a Comment