जीवन के इस महा समर में, सुख-दुख ने मानव को घेरा।नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।
पतझड़ का मौसम जाने पर, बासंती मौसम भी आता।शूल बिछी जब राह पार हो, सुगम राह पर पाँव बढ़ाता।।होगा ही अनुकूल समय पर, कभी मनुज के पग का फेरा।नीरसता क्यों मन में लाना, त मस हटाता नित्य सवेरा।।
वक्त एक सा कभी न रहता, बुरा समय भी टल ही जाता।लोभ-मोह से बंधन तोड़ें, मैल दिलों से तब मिट पाता।।हटी नहीं यदि धुन्ध हृदय से, तभी घेरता रहें अँधेरा।नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।
शीत काँपता देख कृषक को, आतप ठंडा पड़ जाता है।ओलों की चोटों को सहकर, लिए फावड़ा वह आता है।।अंत भला तो सब भला कहे, नए रंग मन भरें चितेरा।नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।
*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

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