'सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला'
मज़मून 36 में चयनित सर्वश्रेष्ठ रचना
किसी झील के मचले
पर्वत शिखर को देखा,
समंदर हो गया उष्मित,
पृष्ठ में आ बदरा बाँह भरने लगे,
शिखरों ने कसमसा
पर्वतों को बात बतलायी,
गहराई झील की उफनी
कम्पन पा किनारों के,
कूल, तरु नतमस्तक
पयोन प्यासे देखे,
समंदर आस में कि
झील से उत्तर नहीं आते,
झील हो
पानी-पानी प्यास अधरों पर
कहे कैसे कि
युगों से बावरी हूँ मैं,
प्रीत पाने को
मेरे शिखरों को छूकर ही
निगोड़े लौट जाते हो
युगों से प्यासी को
प्यासी छोड़ जाते हो,
किनारे जिस दिन
गह्वर के लावे से
झुलस जायेंगे सुनो
शिखर नत हो कहेंगे किस्से
समंदर प्यास देता है
बुझाना प्यास ना जाने
मुझसे मिलना हो फिर भी
आना झील के तीरे
तने शिखर तुम्हारी
बाट जोहेंगे
सच तुम्हारी बाट जोहेंगे।
***गोविन्द हाँकला***



