Sunday, 11 January 2015

झील

'सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला' 
मज़मून 36 में चयनित सर्वश्रेष्ठ रचना 




किसी झील के मचले
पर्वत शिखर को देखा,
समंदर हो गया उष्मित,
पृष्ठ में आ बदरा बाँह भरने लगे,
शिखरों ने कसमसा
पर्वतों को बात बतलायी,
गहराई झील की उफनी
कम्पन पा किनारों के,
कूल, तरु नतमस्तक
पयोन प्यासे देखे,
समंदर आस में कि
झील से उत्तर नहीं आते,
झील हो
पानी-पानी प्यास अधरों पर
कहे कैसे कि
युगों से बावरी हूँ मैं, 

प्रीत पाने को
मेरे शिखरों को छूकर ही
निगोड़े लौट जाते हो
युगों से प्यासी को
प्यासी छोड़ जाते हो,
किनारे जिस दिन
गह्वर के लावे से
झुलस जायेंगे सुनो
शिखर नत हो कहेंगे किस्से
समंदर प्यास देता है
बुझाना प्यास ना जाने
मुझसे मिलना हो फिर भी
आना झील के तीरे
तने शिखर तुम्हारी
बाट जोहेंगे
सच तुम्हारी बाट जोहेंगे।
 

***गोविन्द हाँकला***

Sunday, 4 January 2015

नववर्ष का आगमन

'सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला' 
मज़मून 35 में चयनित सर्वश्रेष्ठ रचना 



स्वागतम स्वागतम नव बसंत सु-स्वागतम,
पीत पीत वसुंधरा पोषित नव कुसुम अनुपम। 


नव-किसलय नव-पल्लव वासित उपवन नूतन,
नव हर्ष आनंदित नव प्रिया उर –तरु मिलन। 


पक्षी विचर रहे शुभ व्योम पर हर्षातिरेक,
चहुँ दिशा नवोत्कर्ष छाया विशेष अभिषेक। 


उन्मत पंकज मकरंद रस निपात अति मधुर,
अनंग वृन्द चोष-चोष पिबम स्वर कामातुर। 


नील व्योम स्फटिक रजनीश संग तारांगन,
चहुँ ओर अति उमंग अनुराग प्रीत प्रांगन। 


मिलन मधुर आलिंगन मधुर मधुरा रस पान,
प्रेयसी की प्यास मधुर बसंत हुई सुख खान। 


ख़ुशी अनन्त है, नयन चपल अयन दिगंत है,
हृदय प्रियंत है, आये कन्त हैं, बसंत है। 


अमिय रस रसवंति, हरी-भरी धरा बसंती,
पुष्प-पुष्प रच रहे चित्र विचित्र लाजवंती। 


ऋतुराज क्षुब्ध हो करे युवा आवाहन,
छोड़ बसंती आलिंगन कर देश भावालिंगन। 


अंतराल के विकट प्रहरी करे गुंजित देश,
क्षितिजपट पर अरुणिमा लिए ‌‌‌‌वयूष विशेष। 


प्रातः की लालिमा ले सुप्त राष्ट्र जगाना है,
बसंत तो फिर मने अनाचार मिटाना है। 


युगदृष्टा समावेष्टा जग केशरिया वसना,
त्याग फाग रंग इस वर्ष हो राष्ट्र चेतना। 

***सुरेश चौधरी***

Sunday, 28 December 2014

उत्सव

'सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला' 
मज़मून 34 में चयनित सर्वश्रेष्ठ रचना 













याद नहीं आया, पिछली बार मिले कब थे?
किस बात के गिले और शिकवे क्यों थे?

एक पल में ही पिघल गयी बर्फ़ रिश्तों की,
दोनों सोचने लगी की अब तक जुदा क्यों थे? 


बहुत याद किया बात कुछ समझ नहीं पायी।
इस बार ईद जब दीवाली से मिलने आयी।

  
ज़रा सा चौंक गयी और ज़रा सा घबराई,
ज़रा सा ठिठकी वो और ज़रा सा सकुचाई,
फिर दौड़ कर बस गले लग गयी दोनों
बहुत रोई मिल कर और बहुत ही पछताई। 


हँसी होंठों पर आँख से ख़ुशी छलक आयी।
इस बार ईद जब दीवाली से मिलने आयी। 


अपने मन्दिर का प्रसाद और मिठाई देकर,
रख दिये मन्दिर में सभी तोहफ़े लेकर,
गले मिली तो इस तरहा कि दो सहेली मिलें,
फिर द्वार पर विदाई दी हाथ मे हाथ लेकर, 


नई ख़ुशियाँ और नई रोशनी लेकर चली आयी।
इस बार ईद जब दीवाली से मिलने आयी। 


***संजीव जैन***

Sunday, 21 December 2014

दरख़्त

सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला 
के साहित्यिक मंच पर 
मज़मून 33 में चयनित 
सर्वश्रेष्ठ रचना 



टूटकर जाने कहाँ खो गए पत्ते,
पर सब्र डिगा नहीं दरख़्तों का।
आज कुछ है तो कल कुछ होगा,
यही तो फितरत है मौसम की।
और कुर्सी की भी ग़ज़ब दिल्लगी,
इंतज़ार फिर किसी के आने का।
हम तो परिंदे हैं कहाँ रुकने वाले,
हमें तो शौक़ है उड़ानों का।
ओ सर्दी तू मुझसे मज़ाक़ तो न कर,
दरिया हूँ मुझे ज़रुरत नहीं बहानों की।
 
***ललित मानिकपुरी***

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...