Sunday, 16 March 2025

खेले सब मिल होली - होली गीत

 

छन्न पकैया छन्न पकैया, यह रसियों की टोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

देवर भाभी खेले होली, भर पिचकारी डारे।
भीगे कपड़े तन-मन भीगे, लगे बहुत ही प्यारे।।
नीर-झील से गहरे इतने, मुखड़ें लगे नशीले,
हुरियारों की टोली जैसे, लगते सब हमजोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

बरसाने की होली सबसे, लगे बहुत ही प्यारी।
लट्ठ-मार होली की देखो, महिमा सबसे न्यारी।।
लोक-गीत गा खूब रिझाते, ऐसी धूम मचाते,
भाव-विभोर किया गीतों ने, लगती मोहक़ बोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

भेद-भाव को भूले सारे, सबको गले लगाते।
सरोबार तन-मन हो जाता, मिलकर सब हर्षाते।।
खुशी जताते फाग खेलते, कुछ पीकर ठंडाई,
जन-जन के इस प्रेम-पर्व में, करते हँसी ठिठोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

Sunday, 9 March 2025

पञ्चचामर छंद

 

न उम्र की ढलान हो न जोश में अपूर्णता।
न हौंसला डिगे कभी न हो कभी अधीनता।
बलिष्ठ रोगहीन हो विचार में प्रगाढ़ता।
निकृष्ट स्फूर्तिहीन आज त्याग दें दरिद्रता।।

सुहावने विहान को सदा निहारते चलो।
न पाँव ये थमें वसुंधरा बुहारते चलो।
क़ुसूर भूल-चूक जो सभी सुधारते चलो।
पुनः मिले न जिंदगी अभी सँवारते चलो।।

न भिन्नता न खिन्नता विषाद का विनाश हो।
नवीनता प्रफ़ुल्लता प्रसन्नता प्रकाश हो।
प्रवास आस प्यास हो सदा नई तलाश हो।
बिना प्रयास के जिए सुनो सजीव लाश हो।।

सूरजपाल सिंह
कुरुक्षेत्र।

Sunday, 2 March 2025

विनती सुनो हमारी - एक भक्ति गीत

 

हे शिव शंकर औघड़दानी, विनती सुनो हमारी।

उग्र महेश्वर हे परमेश्वर, शिव शितिकंठ अनंता।
हे सुरसूदन हरि कामारी, महिमा वेद भनंता।।
रुद्र दिगंबर हे त्रिपुरांतक, प्रभु कैलाश बिहारी।
हे शिव शंकर औघड़दानी, विनती सुनो हमारी।।

अष्टमूर्ति कवची शशि शेखर, देव सोमप्रिय नाथा।
गंगाधर अनंत खटवांगी, चरण धरूँ निज माथा।।
अनघ भर्ग सर्वज्ञ अनीश्वर, विश्वेश्वर रहा निहारी।
हे शिव शंकर औघड़दानी, विनती सुनो हमारी।।

सोम त्रिलोकेश्वर सुरसूदन, पाश विमोचन देवा।
भीम अंबिकानाथ कृपानिधि, नित्य करूँ मैं सेवा।।
शोक हरो प्रभु सकल विश्व के, सारा जगत दुखारी।
हे शिव शंकर औघड़ दानी, विनती सुनो हमारी।।

चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

Sunday, 23 February 2025

शुभ-शुभ - एक गीत

 

शुभ-शुभ शीत ग्रीष्म बरसात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

तेरा शुभ हो मेरा शुभ हो।
नहीं किसी का कभी अशुभ हो।
वैमनस्य कटुभाव रहे ना,
कहो वही जो रहे अचुभ हो।
शुभ-शुभ निकले मुख से बात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

रहे कामना सदा सुमंगल।
बोल कभी ना रहें अनर्गल।
मान प्रभू की इच्छा सुख-दुख,
मिले सुधारस या मिले गरल।
स्वस्थ मांनस हो पावन गात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

सुन्दर शुभकारी रहे सृष्टि।
रहे अपनी सकार की दृष्टि।
अधर मधुर मुस्कान सहेजें,
अमृत सी होती रहे वृष्टि।
शुभ-शुभ वृक्ष सुमन अरु पात।
शुभ-शुभ प्रातः दिन अरु रात।

डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 16 February 2025

भरोसा

 

विश्वास देकर
बिठाया था कंधे पर
अंतरिक्ष की अंगुली पकड़ाकर
दिखाया था धरती पर फैलता
विकास का उजाला,
पुचकार कर
खाली हथेलियों में भर दी थी गर्माहट
रच दिया था चलचित्र का भ्रम,
और मैं
अज्ञात भाषा के शोर में गुम
फावड़ा उठाकर ढहाता चला गया
गिरि- गोलोक, कन्दरा- मन्दिर,
उदधि- उद्भव, नक्षत्रों का छत्र, अतल का तल,
मनोयोग से खोद दी थी
ऋतुओं की गंध, फुहारों की लय,
कुनकुनी धूप, सरकती छांव,
मिटा दिए प्रकृति के सब आदिम पदचिन्ह,
अचानक नथुनों में भर गया धुआँ
बरसने लगे अंगारे,
छा गया अंधेरा
और अब मैं
विश्वास के साथ
अकेला खड़ा हूँ हाशिये पर,
भरोसा उठाने के लिए!
~~~~~~~~~~~
डॉ.मदन मोहन शर्मा
सवाई माधोपुर, राज.

Sunday, 9 February 2025

ज्ञान की नित नव प्रभा से - एक गीत

 

माँ ! तिमिर हर लो हृदय का ज्ञान का उद्भास भर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

कर ध्वनित माँ ब्रह्म लहरी शेष 'मैं' का रह न जाए।
हो अकेला भाव सागर भव व्यथा कुछ रह न पाए।
श्वेत पद्मासन विराजित शारदे तुझको पुकारूँ।
छोड़ कर सारे सितासित यह हृदय तव गीत गाए।
गूँजते हों स्वर प्रणव के ओम् की माँ तृप्ति भर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

भावना के सिन्धु से ये मन सहेजे भाव मोती।
ऊर्मियों की चाँदनी से जो समेटे दिव्य ज्योती।
प्रेम का विस्तार कर दे क्या करेगा अब सघन तम,
आपका ही प्यार पाकर मैं नए सपने सँजोती।
रह न जाए तम भरा कोई किनारा मातु वर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

हो गई है भू बसन्ती मातु तेरी अर्चना में।
झर रही हैं स्वर्ण वर्णी रश्मियाँ तव वन्दना में।
फिर रहे क्यों तम हृदय में शारदे तू तार दे माँ,
भर गए हैं रंग अनगिन मातु स्वागत अल्पना में।
हो रहा है मन तरंगित कल्पना को नव्य स्वर दो।
ज्ञान की नित नव प्रभा से मम हृदय परिपूर्ण कर दो।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 2 February 2025

राजा ऐसा चाहिए जैसे राजा राम - एक गीत

 

राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।
नाम भजो तब सुधरते, हर जन का हर काम।।
..........
राम राज्य की कल्पना, कैसे हो साकार।
कुटिल चाल चलते सभी, बिगड़ी है सरकार।।
दुष्टों के दुष्कर्म से, देश हुआ बदनाम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।
..........
दुष्टों की भरमार है, देखो चारों ओर।
सब पर हावी हो रहे, खूब मचाते शोर।।
लगें ठिकाने दुष्ट ये, तब पाएँ विश्राम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।
..........
दुष्टों का संहार कर, दिया दिव्य संदेश।
जो हम ऐसा कर सकें, सुधरेगा परिवेश।।
ऐसा करने के लिए, करना है संग्राम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।
...........
युग बीते पर आज भी, गुण गाता संसार।
राम राज्य को मानिए, सतयुग का आधार।।
संकल्पित हों हम सभी, कृपा करें सुखधाम।
राजा ऐसा चाहिए, जैसे राजा राम।।

*** मुरारि पचलंगिया

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...