Sunday, 22 February 2026

उर्वर भू यह भारत की - एक गीत

 

संतों की यह पावन धरती, अखिल जगत में न्यारी है।
मातृभूमि को माता कहते, जन्म दिया बलिहारी है।।

कलकल करती बहे जहाँ पर, नदियों की पावन धारा।
जम्बू द्वीपे आर्याव्रत का, कहलाता था यह प्यारा ।।
हिम किरीट सा श्वेत हिमालय, हरित उर्वरा धरणी है।
कलकल करती नदियाँ बहती, लगती कितनी प्यारी है।।

रवि की किरणें यहाँ भूमि पर, नित स्वर्णिम रूप बिखेरे।
अलख जगाने हुए यहाँ पर, कितने ही सन्त चितेरे।।
जन्में वीर हजारों कितने, उर्वर भू यह भारत की।
सदा शत्रुओं से रक्षा करने, सदा रही तैयारी है।।

वायु नीर क्यों करे प्रदूषित, श्वास कहाँ जाकर लेना।
भारत भू के जंगल पर्वत, और नहीं कटने देना।।
भरा खजाना भारत माँ का, अब कोई लूट न पाए।
इसे बचा कर्त्तव्य निभाना, निश्चित जिम्मेदारी है।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

1 comment:

  1. गीत को स्थान प्रदत्त करने के लिए हार्दिक आभार आद.विश्वजीत स्पेन जी

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