Sunday, 27 August 2023

कलाधर घनाक्षरी छंद

 

अंग-अंग में जड़े हुए अनेक रंग पुष्प, शृंग से बने किरीट शीश धारती।
देश-प्रांत में मनोहरी हरीतिमा विखेर, जीव-जंतु हेतु नित्य नीर-क्षीर वारती।।
मंद संदली समीर गा रही विहान गीत, सिंधु-उर्मियाॅं सदैव पाद-सी पखारती।
जन्मभूमि स्वर्ग के समान 'चंद्र' देख नित्य, मुक्त कंठ से करे नमामि मातु भारती।।

*** चंद्र पाल सिंह "चंद्र"

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