Sunday, 13 April 2025

मुम्बई की एक शाम

 

एक शाम
मुम्बई महानगर की
दिन की आपाधापी
थक कर बैठने की प्रक्रिया में है,
पर अब शुरू होती है
घर वापसी की जद्दो जहद,
लोकल ट्रेन में घुसने की होड़,
बसों के पादान पर खड़े होने की
कवायद/तेज़ क़दमों से मेट्रो स्टेशन की ओर
बढ़ता हुज़ूम
मानों अभी जीवन शुरू हुआ हो,
सबकी आँखों में एक अदद चाहत/काश!
हाथों में लेकर चाय का कप/घर के सोफे पे बैठ
धूप का आख़िरी रंग दिख जाए,
पर ऐसा होता कहाँ है।
सूरज अपने तपते चेहरे पर
सिन्दूरी आँचल रख कर विदा लेते दिख
जाता है यदा कदा,
लोकल की विंडो सीट से
वह भी किसी लॉटरी लगने से कम नहीं होता।
हर शाम ही होता है इंतज़ार
फ्राई डे का/शनिवार की छुट्टी का
यही उम्मीद देती है उर्जा
कल सुबह फिर निकलने की
कंक्रीट के जंगल में जलते बल्ब
जुगनुओं का एहसास कराते हैं,
जैसे वे भी जानते हों
कि रात से पहले कुछ कह लेना ज़रूरी है
तभी तो चल पाता है जीवन/इसी दिनचर्या में
हर रोज़ आती है नियम से शाम
क्या आरंभ क्या अंत
बस एक पल
जहाँ समय थमता नहीं,
पर रुक कर मुस्कुरा ज़रूर देता है
और बखूबी समझ लेता है
शब्दों के बीच की ख़ामोशी को
जिसमें छिपा होता है।
एक पूरी कविता का अर्थ
जिसे हम और आप जीवन का
फलसफा कह सकते हैं।

*** राजेश कुमार सिन्हा

Sunday, 6 April 2025

छोड़ कर जाना नहीं प्रिय - एक गीत

 

छोड़ कर जाना नहीं प्रिय साथ मेरे वास कर लो।
पूर्ण होती जा रही मन कामना तनु प्यास भर लो।

मैं धरा अंबर तुम्ही हो लाज मेरी ढाँप लेना।
मैं रहूँ सम्पन्न तू नम रैन अरुणिम ताप देना।
प्राण मेरे हैं तुम्हारी चेतना के आवरण में।
मैं सु्वासित पुष्प सी तू भौर मंजरि आभरण में।
चाँदनी मैं तू समुंदर विकल नभ तक लास भर लो।

तू गया जो प्राण मेरे साथ तेरे हो लिए प्रिय।
आहटों में पत्र सूखे बोलते स्वर खो लिए प्रिय।
हो ठहर तेरी अयन में साँझ का पंथी न बन यों।
आगलित मन भीग ले बस मत विरह रस धार जन यों।
जीवनी के कटु समर में साथ मेरे रास कर लो।

गूँज प्रेमिल फिर पुकारे है मधुर स्मृति मन गगन में।
हो कहीं बेलक जलद फिर अश्रु बोएंगे लगन में।
गीत बन आरोह औ अवरोह की लहरें डुबातीं।
नेह की मृदु पकड़ में आनंद की ठहरें लुभातीं।
इन्द्रधनु के रंग जीवन में सजें नित न्यास कर लो।
छोड़ कर जाना नहीं प्रिय साथ मेरे वास कर लो॥

*** सुधा अहलुवालिया

Sunday, 30 March 2025

जीवन है संगीत - एक गीत

 

शाश्वत गुंजित प्रणवाक्षर का, सतत् चल रहा गीत।
उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत।
चले समीरण सर-सर सर-सर, गाती है निर्भ्रांत।
जल सरिता का कल-कल कल-कल, उच्चारे अश्रांत।
मेघ गरजते बजे नगाड़े, दामिनि दीप्ति अपार।
सप्त स्वरों में करे भारती, झंकृत वीणा तार।
यही अनादिकाल से प्रचलित, होती आई रीत।
उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत।
धरा-चन्द्र रवि-ग्रह उपग्रह सब, सतत् करें संवाद।
सकल विश्व गुंजायमान है, गूँजे अनहद नाद।
मादकता रस घोल रही है, गुंजित कोकिल कूक।
कलरव कर संगीत सुनाएं, नहीं विहग भी मूक।
ब्रह्मानंद निमग्न योगिजन, स्तुतिरत प्रभु प्रीत।
उतर मौन में सुनो ध्यान से, जीवन है संगीत।
अलिगण गुंजन कमल प्रस्फुटन, कर नीरवता भंग।
प्राणिजगत में कोलाहल है, चढ़ा सभी पर रंग।
कर विस्मृत दुख द्वेष ईर्ष्या, मानव तू भी नाच।
यह जीवन अनमोल न दुख की, लगे कही भी आँच।
संकल्पित कर्तव्यशील जन, सदा मनाए जीत।
उतर मौन में सुनो ध्यान से जीवन है संगीत।
डॉ राजकुमारी वर्मा

Sunday, 23 March 2025

"प्रेम का तुम हो समुच्चय" - एक गीत

 

प्रेम का तुम हो समुच्चय प्रेम का प्रतिमान हो।
प्रेम बन कर बह रही जो सृष्टि का अवदान हो।

कर सके कैसे कलम नारी तुम्हारा आकलन।
माँ बहन बेटी सखी को लेखनी करती नमन।
वेद दृष्टा हो स्वयं ही तुम ऋचा का गान हो।
प्रेम बन कर बह रही जो सृष्टि का अवदान हो।

तुम कहीं हो उर्मिला सी और वैदेही कहीं।
हो अगम वन या महल तुम शक्ति बन पति की रहीं।
कर दिया यम को पराजित तुम वही पहचान हो।
प्रेम बन कर बह रही जो सृष्टि का अवदान हो।

देश पर जब आँच आई छोड़ आई आँगना।
हाथ में ले खड्ग लक्ष्मीबाई' सी वीरांगना।
शीश काटे शत्रुओं के देश की तुम शान हो।
प्रेम बन कर बह रही जो सृष्टि का अवदान हो।

रच रही नूतन कहानी हो रहा जय घोष है।
भर रही निज साधना से शक्ति का शुचि कोष है।
व्योम जल थल के स्वयं ही चढ़ चली सोपान हो।
प्रेम बन कर बह रही जो सृष्टि का अवदान हो।

*** सीमा गुप्ता 'असीम'

Sunday, 16 March 2025

खेले सब मिल होली - होली गीत

 

छन्न पकैया छन्न पकैया, यह रसियों की टोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

देवर भाभी खेले होली, भर पिचकारी डारे।
भीगे कपड़े तन-मन भीगे, लगे बहुत ही प्यारे।।
नीर-झील से गहरे इतने, मुखड़ें लगे नशीले,
हुरियारों की टोली जैसे, लगते सब हमजोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

बरसाने की होली सबसे, लगे बहुत ही प्यारी।
लट्ठ-मार होली की देखो, महिमा सबसे न्यारी।।
लोक-गीत गा खूब रिझाते, ऐसी धूम मचाते,
भाव-विभोर किया गीतों ने, लगती मोहक़ बोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

भेद-भाव को भूले सारे, सबको गले लगाते।
सरोबार तन-मन हो जाता, मिलकर सब हर्षाते।।
खुशी जताते फाग खेलते, कुछ पीकर ठंडाई,
जन-जन के इस प्रेम-पर्व में, करते हँसी ठिठोली।
रंग अबीर गुलाल लगाते, खेले सब मिल होली।।

*** लक्ष्मण लड़ीवाला 'रामानुज'

Sunday, 9 March 2025

पञ्चचामर छंद

 

न उम्र की ढलान हो न जोश में अपूर्णता।
न हौंसला डिगे कभी न हो कभी अधीनता।
बलिष्ठ रोगहीन हो विचार में प्रगाढ़ता।
निकृष्ट स्फूर्तिहीन आज त्याग दें दरिद्रता।।

सुहावने विहान को सदा निहारते चलो।
न पाँव ये थमें वसुंधरा बुहारते चलो।
क़ुसूर भूल-चूक जो सभी सुधारते चलो।
पुनः मिले न जिंदगी अभी सँवारते चलो।।

न भिन्नता न खिन्नता विषाद का विनाश हो।
नवीनता प्रफ़ुल्लता प्रसन्नता प्रकाश हो।
प्रवास आस प्यास हो सदा नई तलाश हो।
बिना प्रयास के जिए सुनो सजीव लाश हो।।

सूरजपाल सिंह
कुरुक्षेत्र।

Sunday, 2 March 2025

विनती सुनो हमारी - एक भक्ति गीत

 

हे शिव शंकर औघड़दानी, विनती सुनो हमारी।

उग्र महेश्वर हे परमेश्वर, शिव शितिकंठ अनंता।
हे सुरसूदन हरि कामारी, महिमा वेद भनंता।।
रुद्र दिगंबर हे त्रिपुरांतक, प्रभु कैलाश बिहारी।
हे शिव शंकर औघड़दानी, विनती सुनो हमारी।।

अष्टमूर्ति कवची शशि शेखर, देव सोमप्रिय नाथा।
गंगाधर अनंत खटवांगी, चरण धरूँ निज माथा।।
अनघ भर्ग सर्वज्ञ अनीश्वर, विश्वेश्वर रहा निहारी।
हे शिव शंकर औघड़दानी, विनती सुनो हमारी।।

सोम त्रिलोकेश्वर सुरसूदन, पाश विमोचन देवा।
भीम अंबिकानाथ कृपानिधि, नित्य करूँ मैं सेवा।।
शोक हरो प्रभु सकल विश्व के, सारा जगत दुखारी।
हे शिव शंकर औघड़ दानी, विनती सुनो हमारी।।

चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...