Sunday, 17 March 2024

रस्म-ओ-रिवाज - एक ग़ज़ल

 

रस्म-ओ-रिवाज कैसे हैं अब इज़दिवाज के
करते सभी दिखावा क्यूँ रहबर समाज के

आती न शर्म क्यूँ ज़रा माँगे जहेज़ ये
बढ़ते हैं भाव रोज़ ही राजाधिराज के

ख़ुद आबनूस हैं तो क्या दुल्हन हो चाँद सी
नख़रे बड़े अजीब हैं मिर्ज़ा-मिज़ाज के

बारात की न पूछें नशा ख़ूब है किया
नागिन का नाच नाचें तनुज नाग-राज के

शादी का भोज थाली से नाली में जा रहा
ज़िंदा ग़रीब कैसे रहें बिन अनाज के

बेटी न बोझ सर पे क्यूँ कर्ज़ा उठा लिया
लड़की का बाप मर रहा क्यूँ बिन इलाज के

'सूरज' नक़ल न रास रईसों की आएगी
शादी, विवाह बन गये मसले क्यूं लाज के

सूरजपाल सिंह
कुरुक्षेत्र।

1 comment:

  1. I appreciate the genuine passion you convey in every piece you write.

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