जिंदगी की धूप जब जब गुनगुनी लगने लगे ।
चार दिन का ये सफ़र जब ज़िन्दगी लगने लगे ।
उस खुदा की है इनायत यूँ समझ लेना सभी,
दोस्ती जब आपको इक बन्दगी लगने लगे ।।
*****************************
*** गुरचरन मेहता 'रजत' ***
उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर। छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर। । पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी। करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भा...
No comments:
Post a Comment