Sunday, 23 July 2017

प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल

 
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल,
सघन, सुवासित, अतिशय चंचल,
नेह निमंत्रण देते पल पल।
तन-मन हो उठता उच्छृंखल ।।
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल...


मुख पर बिखरें ऐसे खुलकर,
भ्रमर-झुण्ड ज्यों नत फूलों पर,
करते गुंजन, होकर विह्वल।
झंकृत हो उठता अंतस्थल।।
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल...


चोटी में बल खाते ऐसे,
सर्प-युगल क्रीड़ा-रत जैसे,
अंग अंग छूते हैं प्रतिपल।
मधुरस धारा बहती अविरल।।
प्रिये तुम्हारे मोहक कुंतल...


***** प्रताप सिंह

No comments:

Post a Comment

उमड़-घुमड़ घन - कुण्डलिया

  उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर। छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर। । पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी। करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भा...