Sunday, 31 July 2016

सावन आ गया है


मस्ती भरी कजरी छेड़ दे री सजनी, कि सावन आ गया है

साँवरे के रूप-सी छा रही काली घटाएँ,
संदेशा पिया का ला रही पुरवा हवाएँ,
सोलहों सिंगार कर ले अरी बावरी, कि सावन आ गया है


नाचती बूँदों के संग-संग पायल छनक उठी,
कलाई पर अनजाने ही ये चूड़ी खनक उठी,
मदहोश- सी नाच रही वन में मयूरी, कि सावन आ गया है


हरी चुनरिया ओढ़ कर ये धरा भी झूम रही,
मदमत्त-सी लता भी तरु का मुखड़ा चूम रही,
ओ री सखि मैं भी हो चली बावरी, कि सावन आ गया है


मस्ती भरी कजरी छेड़ दे री सजनी, कि सावन आ गया है

********************************************
***** बिहारी दुबे

No comments:

Post a Comment

ब्रह्म का स्वरूप माँ

  सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ। जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ। दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती। कण्ठ से लगा कभी मम...