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तमस हटाता नित्य सवेरा - गीत
जीवन के इस महा समर में, सुख-दुख ने मानव को घेरा। नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।। पतझड़ का मौसम जाने पर, बासंती मौ...
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जब उजड़ा फूलों का मेला। ओ पलाश! तू खिला अकेला।। शीतल मंद समीर चली तो , जल-थल क्या नभ भी बौराये , शाख़ों के श्रृंगों पर चंचल , कुसुम-...
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मानव (१) मैं भी मानव हूँ। एहसास इसका, इसलिए नहीं होता, कि परिभाषा के अनुकूल मैं भी हूँ। बल्कि, इसलिए होता है क्योंकि मैं भी बे...

संजीव सर ,बहुत गहराई हैं आपकी कविता मॆ.
ReplyDeleteसादर आभार आदरणीय आलोक जी.
Deleteसुंदर भावो की अनुपम प्रस्तुति
ReplyDeleteसादर आभार आपका आदरणीय लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी. सादर नमन
ReplyDeleteसुंदर जीवन दर्शन , सादर बधाई आदर्णीय संजीव सर जी , आदर्णीय सपन सर जी बेहतरीन ब्लोग हेतु हार्दिक बधाई |
ReplyDeleteसादर आभार आपका आदरणीया.
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