Sunday, 10 July 2016

ईद पर चार कह मुकरिया




1.
 

पाक मास रमजान रवाना,
तभी हुआ फिर उसका आना,
मैं तो उसकी हुई मुरीद,
क्या सखि साजन ? ना सखि 'ईद'

 
2.
 

रोज़े रखकर उसको पाया,
उसने मुझको गले लगाया,
उससे लगी बड़ी उम्मीद,
क्या सखि साजन ? ना सखी 'ईद'

 

3.
 

उसका आना ख़ुशियाँ लाया,
गिले दूर कर गले लगाया,
उसने आज उड़ा दी नींद, 

क्या सखि साजन ? ना सखि 'ईद'

4.
 

जब भी होता उसका आना,
मौसम लगने लगे सुहाना,
विपदायें हो जाये रसीद,
क्या सखि साजन ? ना सखि "ईद"


**हरिओम श्रीवास्तव**

No comments:

Post a Comment

एक बेहतरीन ग़ज़ल - हो फ़लसफ़ा ऐसा

  दुविधा रही मन में गहन अभ्यास के उपरांत भी तरकश में तो इस जिंदगी के सज गए सिद्धांत भी दर्शन यही लेकर सृजन भी कर रहा है पुण्य का श्रम क...