Sunday, 10 April 2016

ये जहाँ देखिए



कितना वीरान है गुलसिताँ देखिए
रेत का ढेर है सब मकाँ देखिए


तपती आगोश में गेरुआ है समाँ 
कैसी सूरज की ये दास्ताँ देखिए

हाय, बूंदों के लाले पड़े हर तरफ
ये समंदर भी प्यासा यहाँ देखिए


ये ज़मीं जल रही, आसमाँ जल रहा
आज जलता हुआ ये जहाँ देखिए


कट रहा है शजर, पंछी ये पूछते
अब बनाए कहाँ आशियाँ देखिए
 

 ***** आराधना

No comments:

Post a Comment

उर्वर भू यह भारत की - एक गीत

  संतों की यह पावन धरती, अखिल जगत में न्यारी है। मातृभूमि को माता कहते, जन्म दिया बलिहारी है।। कलकल करती बहे जहाँ पर, नदियों की पावन धारा। ज...