Sunday, 14 May 2023

सांध्य की शोभा निराली - एक गीत

 

सांध्य की शोभा निराली स्वर्णमय प्रति पर्ण है।
घट रजत उल्टा पड़ा बिखरा चतुर्दिक स्वर्ण है।

पूर्ण दिन श्रमशील रह दिनकर जगत हित साधते,
कर्म का संदेश दे खुद कर्म ही आराधते,
चित्त आनन्दित रहे मन है युवा नहि जर्ण है।
सांध्य की शोभा निराली स्वर्णमय प्रति पर्ण है।

हों उदित सविता बिखेरें रश्मियाँ पाटल रचित,
जागते हैं प्राणिजन व्यवसाय वे साधें उचित,
मुस्कराते पुष्प अरु उद्यान मय सब वर्ण है।
सांध्य की शोभा निराली स्वर्णमय प्रति पर्ण है।

देख कर अवसान वेला का विभव जन-मन चकित,
खेद किंचित भी नहीं रवि की किरण सोना खचित,
मुस्कराहट युग अधर से है खिची आकर्ण है।
सांध्य की शोभा निराली स्वर्णमय प्रति पर्ण है।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 7 May 2023

जीवन की दशा पर एक गीत

 

धूप न देखी दीप न जोया, श्वेत हो गए बाल,
छाॅंव गाँव में कटी दुपहरी, बदन हो गया लाल।
जन्म लग्न में राहु पड़ा है, भाग्य लग्न में केतु,
मंगल दंगल करे केन्द्र में, टूटा जीवन सेतु,
कालसर्प ने रस्ता रोका, दोष गिनाये लाख,
अघटित योग बने अपयश के, बची हाथ में राख।

घर के दरवाज़े से भैय्या, फूटा अपना भाल,
धूप न देखी दीप न जोया, श्वेत हो गए बाल।

शुक्र बनाता योग कभी शुभ, एक ऑंख से देख,
बनने लगती है हाथों में, धनागमन की रेख,
तभी उच्च का बुध आकर के, दे जाता है ज्ञान,
भाग न तू लक्ष्मी के पीछे, दे पुस्तक में ध्यान।

रबड़ी मान राबड़ी खाई, फँसा दाढ़ में गाल,
धूप न देखी दीप न जोया, श्वेत हो गए बाल।

ढैय्या रोते - रोते उतरा, मुख आई मुस्कान,
लगी नोचने साढ़े साती, लेकर जाऊँ जान,
बारह आठ चार खाने में, ग्रह युतियों का मेल,
हार- जीत का खेल न खेले, बना रहे हैं रेल।

दया- धर्म- सेवा की बातें, खींच रही है खाल,
धूप न देखी दीप न जोया, श्वेत हो गए बाल।

क्रूर ग्रहों की अशुभ दृष्टि से, बचा रहे थे चन्द्र,
छिपे मेघ के पीछे जाकर, मुस्काकर के मंद्र,
गुरु ने कुछ वक्री होकर भी, ख़ूब निकाला तोड़,
अब शीर्षासन लगे कराने, सूर्य देव घर फोड़।

देशी घी में छोंक हींग का, फिर भी गली न दाल,
धूप न देखी दीप न जोया, श्वेत हो गए बाल।
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डॉ. मदन मोहन शर्मा
सवाई माधोपुर, राज.

Sunday, 30 April 2023

कैसी दूरी - दोहे

 



अपनों से दूरी बनी, मिला गैर का साथ।
आफत में कोई नहीं, मलो बैठ कर हाथ।।

रखकर जीवन पाक ही, काम करें कुछ नेक।
अच्छे को अपनाइए, ग़लत दीजिए फेक।।

कैसे होती दूरियांँ, रही याद जो पास।
यादों की जादूगरी, मधुर सभी अहसास।।

चाहे जितनी दूरियाँ, बने रहोगे खास।
हुई जनम भर के लिए, सजना तेरी दास।।

आज मशीनी काल है, दूरी मिटी तमाम।
करे वीडियो कॉल से, सभी ज़रूरी काम।।

*** साधना कृष्ण

Sunday, 23 April 2023

पावन कन्या दान - एक गीत

 

लोक रीति अति सुन्दर संगम, वर-वधु ब्याह विधान।
धर्म-धरा-धृत नर-पुंगव कर, पावन कन्या दान।

छाजन बाजन लोक लुभावन, गीत उठे समवेत।
माँग सजा सिंदूरी सजनी, अनगढ़ ये संकेत।
भेज ससुर घर राजदुलारी, भीगे नैन अगाध,
रही स्वकीया सतत सनातन, धर्म धरा की आन
पावन कन्या दान।

सुता परायी रही जनम से, थाती जो अनमोल।
मिला न अधिकृत मान जगत में, चिंतन करिए तोल।
सृष्टि सुगम की रचना महती, राजा हो या रंक,
परिणय बंधन दो कुल जोड़े, इक दूजे का मान।
पावन कन्या दान।

बढ़ी निराशा हृदय निरंकुश, कर्म न विधि अनुकूल।
खुद को क्षमा नहीं करता मन, सप्तपदी को भूल।
बंध्या करना माँ का आँचल, ऐसी मति पर खेद,
नर से नर औ नारी तत्पर, खोकर निज पहचान।
पावन कन्या दान।

लोक रीति अति सुन्दर संगम, वर-वधु ब्याह विधान।
धर्म-धरा-धृत नर-पुंगव कर, पावन कन्या दान।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

Sunday, 16 April 2023

करूँ अर्चना तेरी - एक गीत

 

मन-मन्दिर में तुझे बिठाऊँ, अभिलाषा यह मेरी।
दो नैनों के दीप जलाऊँ, करूँ अर्चना तेरी।

सुबह-सबेरे मन का आँगन, अच्छी तरह बुहारा।
कोना-कोना धोकर हे प्रभु, तुझको आन पुकारा।
धूप जला अब करूँ आरती, करना नहीं अबेरी।
दो नैनों के दीप जलाऊँ, करूँ अर्चना तेरी।

रोली-चावल चन्दन-टीका, ली पुष्पों की माला।
घी-लोबान अगरु ले सुरभित, हवन कुंड में डाला।
शुचि-पावन पथ किया जतन से, अब मत करना देरी।
दो नैनों के दीप जलाऊँ, करूँ अर्चना तेरी।

कब से स्वप्न सजाये मैंने, अभिनन्दन हो तेरा।
महक उठे घर-आँगन मेरा, जब हो नाथ बसेरा।
आकर नाथ मिटा दो अब तो, जनम-जनम की फेरी।
दो नैनों के दीप जलाऊँ, करूँ अर्चना तेरी।

डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 9 April 2023

खाली हाथों जाना - एक गीत

 



खाली हाथ जगत में आया, खाली हाथों जाना।
धर्म-कर्म की ओढ़ चुनरिया, नहीं पड़े पछताना।।

खुली बेड़ियाॅं छूट नर्क से, स्वर्ग-धरा पर आया।
सभी हॅंसे थे पर तू रोया, देख जगत की माया।।
भूल गया है वापस जाना, कुछ दिन यहाॅं ठिकाना।
खाली हाथ जगत में आया, खाली हाथों जाना।।

यौवन का मदिरालय छलका, मृगतृष्णा ने घेरा।
भोग-रोग के संग प्यास ने, डाल दिया है डेरा।।
मन-तुरंग ने सोच लिया जो, उसे वही है पाना।
खाली हाथ जगत में आया, खाली हाथों जाना।।

गई बहारें पतझड़ आया, फीके लगें नज़ारे।
काया-माया साथ न देती, छूटे सभी सहारे।।
हंस उड़ा तज मानसरोवर, रूठ गया जब दाना।
खाली हाथ जगत में आया, खाली हाथों जाना।।

*** चंद्र पाल सिंह "चंद्र"

Sunday, 2 April 2023

श्रीराम नवमीं पर विशेष

 

मर्यादा पुरुषोत्तम ने,
जीना हमें सिखाया।
सच्चा जीवन बने त्याग से,
जी कर हमें दिखाया।।

महल त्याग वनवास लिया था,
पितु के वचन निभाए।
पैदल चल कर वन-वन घूमे,
कंद-मूल फल खाए।।

संतों का उद्धार किया था,
दुष्ट सभी थे मारे।
भिलनी के झूठे बेरों को,
सहज भाव स्वीकारे।।

वनवासी जनजाति वर्ग को,
हँस-हँस गले लगाया।
सबके हित में अपना हित है,
अपना धर्म बनाया।।

अपनाएँ आदर्श सभी हम,
स्वर्ग धरा पर आए।
रच कर *रामचरित-मानस* को,
तुलसी ने गुण गाए।।

यही सार है रामायण का,
पढ़, समझो सब भाई।
दृढ़ विश्वास रहे जो मन में,
मिलें हमें रघुराई।।

*** मुरारि पचलंगिया

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...