Sunday, 15 January 2023

दो कुंडलिया

 

सीमा पर सैनिक खड़ा, पूरा ध्यान लगाय।
दुश्मन उसके शौर्य से, छिपा हुआ थर्राय।।
छिपा हुआ थर्राय, हिंद से पार न पाए।
गरजे अपना लाल, गर्व से मां मुस्काए।।
कभी न हो अभियान, देश का अपने धीमा।
रहे सुरक्षित चीन-पाक से अपनी सीमा।।


पूरा करना राम जी, सबका अच्छा काम।
दुखी न कोई भी रहे, पाए सुख, आराम।।
पाए सुख, आराम, नहीं कोई भी रोए।
करें सभी श्रम खूब, तरक्की सबकी होए।।
रहे न कोई स्वप्न, किसी का कभी अधूरा।
चहके भारत देश, मनोरथ होए पूरा।।

*** राजकुमार धर द्विवेदी

Sunday, 8 January 2023

आधा और अधूरा - चौपाई छंद

 

सीता बिन श्रीराम न पूरे।
बिना राधिका श्याम अधूरे॥
अर्द्धचन्द्र बिन 'ॐ' न पूरा।
शक्ति बिना शिव रहे अधूरा॥1॥
🌸
अर्द्धांगिनि बिन सूना आँगन।
आधा और अधूरा जीवन॥
पत्नी बिन है प्रीति अधूरी।
जीवन की हर रीति अधूरी॥2॥
🌸
कर्म बिना है धर्म अधूरा।
बिना क्षेम के योग न पूरा॥
प्रेम बिना है भक्ति अधूरी।
बात अभी तक हुई न पूरी॥3॥
🌸
कुन्तल श्रीवास्तव,
डोंबिवली, महाराष्ट्र।

Sunday, 1 January 2023

नवल वर्ष में

 

नवल वर्ष में, नव आशाएं, लहराएं।
नवल वायु के, झोंके पल-पल, बलखाएं।

नई सुबह का,
अभिनंदन
है, खुशी न कम।
ध्यान लगाएं, जतन करें तो, भागें गम।
सदा हृदय से, गीत जीत के, ही गाएं।
नवल वर्ष में, नव आशाएं, लहराएं।

कर्म करें पर, शरण प्रभू की, सदा गहें।
जो बोलें वह, मन से सच्ची, बात कहें।
सच्चाई को, नए वर्ष में, गहराएं।
नवल वर्ष में, नव आशाएं लहराएं।

मस्त रहें हम, व्यस्त रहें अरु, मिलें जुलें।
मन में गाँठें, कभी न बाँधें, खूब खुलें।
पहले की सब, धो कड़वाहट, हरसायें।
नवल वर्ष में, नव आशाएं, लहराएं।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

Sunday, 25 December 2022

कुरुक्षेत्र है जीवन अपना - एक गीत

 

कुरुक्षेत्र है जीवन अपना, कदम-कदम पर महासमर है।
लाक्षागृह है भवन हमारे, इन्द्रप्रस्थ यह नया नगर है॥
पाण्डुर वर्ण ज्ञान से बोझिल, जन्म अंधता का वर बल है,
अंधे का सहचर भी अंधा, अनुचर उसका छल में खल है,
बल शत भागों में बॅंटकर भी, लेता है छल का आश्रय ही,
पंच प्राण रह अडिग धर्म में, बसते हैं विधि वश अरण्य ही,
भीषण व्रत धारे संन्यासी, मठ के बन्दी सिले अधर है।
कुरुक्षेत्र है जीवन अपना, कदम-कदम पर महासमर है॥
नीति उपेक्षित खड़ी द्वार पर, भीगे नयन न्याय नत मुख है,
चीर हरण के सभी समर्थक, सिंहासन का सबको दुख है,
हाथ पसारे खड़ा पुरोहित, मौनी गुरु का गौरव हत है,
सब खाते सौगंध सत्य की, दिखता नहीं कर्म में सत है,
भेद न जान सका जल-थल का, दोषी निर्मल स्वच्छ डगर है।
कुरुक्षेत्र है जीवन अपना, कदम-कदम पर महासमर है॥
जहाँ लाभ संभाव्य वहीं हम, वहीं धर्म की नींव सुदृढ़ है,
वही मार्ग है शास्त्र प्रमाणित, जहाँ स्वार्थ हित वचन अदृढ़,
धर्म-न्याय की पीट डुगडुगी, महारथी बन खड़े युद्ध में,
घेर मारते हैं बालक को, फिर श्रद्धा-विश्वास बुद्ध में,

बरस रहा जल स्रोत सूखते, गल से बहती गरल नहर है।
कुरुक्षेत्र है जीवन अपना, कदम-कदम पर महासमर है॥
~~~~~~~~~~~
डॉ. मदन मोहन शर्मा
सवाई माधोपुर, राज.

Sunday, 18 December 2022

नदी किनारे - एक गीत

 

नदी किनारे सुंदर कुटिया, सन्त बसाते हैं।
कुदरत के ये दृश्य मनोहर, हमें लुभाते हैं।।

हिमगिरि से निकली ये नदिया, सतत यहाँ बहती।
कितनी मोहक धरा देश की, तपोभूमि लगती।।
सूर्य रश्मियों से चमके पर्वत, खूब सुहाते हैं।
कुदरत के ये दृश्य मनोहर, हमें लुभाते हैं।।

शांत मनोरम जगह देखकर, सबके नयन खिले।
नदी किनारे खड़े वृक्ष से, ठण्डी छाँव मिले।।
सम्मोहित पुष्पों से सुरभित, धरा सजाते हैं।
कुदरत के ये दृश्य मनोहर, हमें लुभाते हैं।।

स्निग्ध छुअन ये नीर दिलों में, नदियों का अर्चन।
चन्दन सा मन भरे हिलोरे, करता काव्य-सृजन।।
जहाँ सुखद उल्लास बरसता, हमें रिझाते हैं।
कुदरत के ये दृश्य मनोहर, हमें लुभाते हैं।।

*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Sunday, 11 December 2022

कभी न होगी हार - दोहे

 

आज सूचना-तंत्र के, जर्जर सारे तार।
बिकी देश की मीडिया, बिके सभी अख़बार॥1॥

कठपुतली सब हो गये, लोकतंत्र आधार।
चौथा खम्भा देश का, करता अब व्यापार॥2॥

सच्ची ख़बरों के सभी, बन्द हुए अब द्वार।
दरवाजे पर है खड़ा, तगड़ा चौकीदार॥3॥

धन शाहों का तंत्र पर, देख बढ़ा अधिकार।
लोकतंत्र लुंठित हुआ, कुंठित वाणी धार॥4॥

ख़बरों की लेने ख़बर, जागेगा संसार।
कलमकार के कलम की, कभी न होगी हार॥5॥

भ्रष्ट व्यवस्था पर सदा, करता तीखे वार।
पत्रकार जो हो निडर, होता पहरेदार॥6॥

समाचार सच दे सदा, जिसे देश से प्यार।
पाना सच्ची सूचना, जनता का अधिकार ॥7॥
🌸
कुन्तल श्रीवास्तव.
डोंबिवली, महाराष्ट्र.

Sunday, 4 December 2022

बीती ताहि बिसारि दे

 

बीती ताहि बिसार दे, मत कर उसको याद।
बुरा समय अब जा चुका, सुख है इसके बाद।
सुख है इसके बाद, सुनहरे सपने देखो।
हो भविष्य निर्माण, सोच कर निश्चय लेखो।
मन में करो प्रतीति, मान लो बाजी जीती।
जियो खुशी से मीत, भूल सब बातें बीती।।

बीती ताहि बिसार दे, वर्तमान को देख।
सोच-समझ कर पाँव रख, ऊँची-नीची रेख।
ऊँची-नीची रेख, धरातल नहीं एक-सा।
आस-पास का दृश्य, मिले नहि कहीं एक-सा।
बसी हृदय में चाह, नहीं रह जाए रीती।
चढ़ो नए सोपान, भूल पहले की बीती।।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...