Sunday, 17 July 2022

गुरु प्रसाद

 

गुरु सहज अंतस तमस में दीप धर देता।
दूर कर अवसाद पावन ज्योति भर देता।

तत्व गुरु निर्गुण सगुण चैतन्य धारा है।
प्रेम श्रद्धा आसरा विश्वास सारा है।
गुरु कृपा घन वेदना से दीन क्षर देता।
दूर कर अवसाद पावन ज्योति भर देता।

हो सुसंस्कृत आचरण शुभ खींचता है मन।
जीव हो या पुष्प परिमल सींचता है तन।
ज्ञान निज का गुरु बनें तो जीत वर देता।
दूर कर अवसाद पावन ज्योति भर देता।

अनवरत हम सीखते हैं मानते कम हैं।
है प्रकृति यह सद्गुरू पर जानते कम हैं।
चक्षु करुणा से भरे गुरु धीर स्वर देता।
दूर कर अवसाद पावन ज्योति भर देता।

कृष्ण गीता ज्ञान जीवन सार विस्तृत है।
आचरण श्री राम का प्रति याम चित्रित है।
गुरु स्वजन अवचेतना नवनीत कर देता।
दूर कर अवसाद पावन ज्योति भर देता॥

*** सुधा अहलुवालिया

Sunday, 10 July 2022

मधुर मिलन

 

मधुर मिलन को आतुर नदियाँ, सदा समाती सागर में।
झरें नेह की बूंद आँख से, भरे हृदय की चादर में।।

हरियाली के दृश्य मनोहर, खूब रिझातें पावस में।
झूम-झूम कर कजरी गाते, हास्य बिखेरे आपस में।।
प्यार भरा हो दिल में मानो, भरा समंदर गागर में।
मधुर मिलन को आतुर नदियाँ, सदा समाती सागर में।।

प्राण पगे रस रूप गन्ध में, मुस्काता मन यौवन में।
भरे कुलाचे घूम-घूम कर, मानव मन चन्दन वन में।।
वही सुखद उल्लास बरसता, रिसता प्रेम समादर में।
मधुर मिलन को आतुर नदियाँ, सदा समाती सागर में।।

कली फूल पर भँवरे डोले, बिछी सेज मृदु फूलों की।
नेह निमंत्रण देता उपवन, बाट जोहते झूलों की।।
राम-भरत सा मधुर मिलन हो, प्रेम परस्पर दादर में।
मधुर मिलन को आतुर नदियाँ, सदा समाती सागर में।।


*** लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

Sunday, 3 July 2022

धरा हुई है धानी

 



खेतो में छाई हरियाली, धरा हुई है धानी
उमड़-घुमड़ घन काले छाएरिमझिम बरसे पानी

सपन सँजो कर गोरी बोए, पौधे सँग तकदीरें
पीले हाथों में सजना सँग, होंगी अब तस्वीरें
डोली जाएगी बाबुल के आंगन से जब मेरी
पिया मिलन की बेला में तब, होगी भौर सुहानी
खेतो में छाई हरियाली, धरा हुई है धानी

कर्ज़ मुक्त बापू होगा तो, माँ को चैन मिलेगा
दूर देस भाई पढ़ आए, मन का फ़ूल खिलेगा
अफ़सर बन वो आएगा जब लम्बी सी गाड़ी में
लाएगा भाभी मेरी वो परियों की जो रानी
खेतो में छाई हरियाली, धरा हुई है धानी

अब के बोलूंगी राखी पर बेशक़ कुछ मत देना
माँ की साड़ी पिता की ऐनक एक नहीं दो लेना
इतने से क्यूँ काम चलेगा बोलूंगी भाई को
मुझको भी साइकिल ले देना बेशक नई पुरानी
खेतो में छाई हरियाली, धरा हुई है धानी

सूरजपाल सिंह,
कुरुक्षेत्र।

Sunday, 26 June 2022

ख़ुशी/आनंद पर दोहे

 

खुशी हृदय का भाव है, रहती सब के पास।
नहीं मिले बाजार में, क्रय का व्यर्थ प्रयास।।

प्रेम पूर्ण व्यवहार है, खुशियों का आधार।
स्वार्थ हीन सत्कर्म से, लेती हैं आकार।।

धन वैभव सम्मान में, व्यर्थ खुशी की खोज।
पीर परायी जो हरे, उसको मिलती रोज।।

नहीं किसी को कष्ट दें, सुख का करें प्रबंध।
मानव मन की तृप्ति से, खुशियों का अनुबंध।।

खुशी/शोक नित बाॅंटता, जो कुछ जिसके पास।
सुरभि विखरती पुष्प की, जैसे बिना प्रयास।।

*** चंद्र पाल सिंह "चंद्र"

Sunday, 19 June 2022

ताक़त - आल्हा छंद

 

 


शारीरिक ताक़त के बल पर, करो न हरगिज़ अत्याचार।
जो भी आया है दुनिया में, सबको जीने का अधिकार।
शक्ति भरोसे पा लो चाहे, धन दौलत सब अपरंपार।
किन्तु दिखाकर ताक़त सुन लो, कभी नहीं पाओगे प्यार। 
 
ताक़त कलम अगर बन जाये, तो बदले भू का इतिहास।
राजनीति के चतुर खिलाड़ी, को भी है इसका अहसास।
शाम दाम छल दण्ड भेद से, फ़तह हुए कितने दरबार।
जिनसे उनकी परम मिताई, बन बैठे वै ही सरदार। 
 
जिसकी लाठी भैंस उसी की, किस्सा जाने सकल जहान।
किसी किसी को ही बख़्शा है, ईश्वर ने ऐसा वरदान।
सहनशीलता और मृदुलता, हैं बल की असली पहचान।
क्षुद्र मानसिक परसंतापी, को मिलता हरदम अपमान। 
 
तन की ताक़त गौण रही है, बुधि बल का होता सम्मान।
संत विवेकानन्द ज्ञान से, सकल विश्व में बने महान।
ईश्वर ने दी है जो ताक़त, उससे करो लोक कल्याण।
अपने हित से ऊपर उठकर, करो देश का नव निर्माण। 
 
कृष्ण कुमार दूबे

Sunday, 12 June 2022

ग्रीष्म ऋतु

 

है चरम पर ताप तपती ग्रीष्म ऋतु झुलसा रही है।
खग विहग संसृति तृषित राका अनल बरसा रही है।
आँधियों का है बवंडर बूँद का रिमझिम छलकना।
श्वास औ प्रति श्वास बाधित स्वेद कण कण का ढलकना।
बावरी पुरवाइ विरहिन का मनस तरसा रही है।
खग विहग संसृति तृषित राका अनल बरसा रही है।

ताल पोखर बावली सलिला विरह में नागरी सी।
शांत लहरें नीर उथला रिक्त जीवन गागरी सी।
शुष्क जीवन सिलवटें चुप वीशिका दरसा रही है।
खग विहग संसृति तृषित राका अनल बरसा रही है।

शान्त हलचल मौन कलरव नीड़ में है दुबक बैठा।
सूर्यरथ है अग्नि रोपे व्योम पर आछन्न ऐंठा।
पात झरते नग्न डाली कोकिला सरसा रही है।
खग विहग संसृति तृषित राका अनल बरसा रही है।
*
*** सुधा अहलुवालिया




Sunday, 5 June 2022

'सूफ़ी नगमा'

 


ढूँढते फिर रहे दरबदर हम जिसे,
वो हमीं में है हम को ख़बर ही नहीं।
मन्दिरों-मस्जिदों में मिलेगा न वो,
बन्दगी में हमारी असर ही नहीं।।

फ़ितरत-ए-सानिया ऐब लाखों भरे,
बात क्यूँ वो सुनेगा हमारी भला।
रोज़ रोज़ा किया नाम उसका लिया ,
पाप करते रहे हमको डर ही नहीं।।

राम अल्लाह सतगुरु सभी नाम ये,
तुमको अच्छा लगे जो पुकारो वही।
एक ईश्वर सभी में समाया हुआ,
देख लें हम ख़ुदा वो नज़र ही नहीं।।

सागरों पर्वतों में न ढूँढो उसे,
काशी काबा में कब तक रहोगे फँसे।
मन के भीतर ज़रा झाँक लें हम अगर,
नूर उसका हमारा इतर ही नहीं।।

चाँद 'सूरज' ज़मीं आसमाँ में वही,
झील झरने की धारा में बहता वही।
ज़र्रा ज़र्रा उसी का बनाया हुआ,
सच इधर भी वही है उधर ही नहीं।।

*** सूरजपाल सिंह

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...