Sunday, 19 January 2020
पाप/दोष/गुनाह पर दोहे
पानी संचय कीजिये, कल की खातिर आप।
व्यर्थ बहाना नीर को, बहुत बड़ा है पाप।।
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दीन हीन को तंग कर, सुख पाते यदि आप।
इस जग में होता नहीं, इससे बढ़कर पाप।।
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दोष पराये देखकर, उठे हृदय में रोष।
वे जन सारे देख लें, पहले अपने दोष।।
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दशा दीन की देखकर, दिल से उठती आह।
फिर न मदद करते अगर, सबसे बड़ा गुनाह।।
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नयन मूँद करते अगर, बाबा में विश्वास।
पाप-कृत्य समझें इसे, सबसे है अरदास।।
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दुर्घटना में देख सुन, अक़्सर आह कराह।
चल देना मुँह फेर कर, होता बड़ा गुनाह।।
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पाप-पुण्य के नाम पर, होता है व्यापार।
अपने घर के भर रहे, चंद लोग भण्डार।।
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*** गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी ***
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