Sunday, 12 January 2020

दण्ड/सज़ा पर दोहे

 


डस लेता है बुद्धि को, अक्सर ही यह क्रोध।
फिर पीड़ित होकर मनुज, करे दण्ड का बोध।।


जब रिश्तों को स्वार्थ की, लग जाती है ठंड।
तब जीवन यह काटना, बन जाता हैै दंड।।


आत्ममुग्धता का लगे, जब मानव को रोग।
कर्त्तव्यों की राह तब, सज़ा समझते लोग।।


जीवन में संघर्ष पथ, सज़ा नहीं है मित्र।
इस पर बढ़ने से हुआ, जीवन सदा सुचित्र।।



*** अनुपम आलोक ***

No comments:

Post a Comment

एक बेहतरीन ग़ज़ल - हो फ़लसफ़ा ऐसा

  दुविधा रही मन में गहन अभ्यास के उपरांत भी तरकश में तो इस जिंदगी के सज गए सिद्धांत भी दर्शन यही लेकर सृजन भी कर रहा है पुण्य का श्रम क...