Sunday, 5 January 2020
कुछ उत्तर दो आगत कुमार
हे अभ्यागत! मन चंदन कर,
अभिनन्दन तेरा करती हूँ।
लेकिन मेरे कुछ यक्षप्रश्न,
हल करने को भी कहती हूँ।
पितु की इच्छा पर क्या फिर से,
वनगमन राम कर पाएँगे?
क्या माया मृग मारीच वंश,
भारत में मारे जाएँगे?
कलुषित उर सरि की धारा को,
क्या कर पाओगे शुचित धार?
कुछ उत्तर दो आगत कुमार!
हे आशाओं के राजमहल,
हे स्वप्न शिखा के स्पंदन,
हे प्रखर सूर्य जिज्ञासा के,
अभिलाषा के रोली-बंदन।
बोलो आगत! मन चेतन में,
क्या दीन-दया भर सकते हो?
कुंठित मानवता के उर को,
क्या कुछ पावन कर सकते हो?
आहत मीरा, राधा, सीता,
रावण का फिर से मुदित द्वार।
कुछ उत्तर दो आगत कुमार!
ये राजमुकुट की अभिलाषा,
क्या धर्मयुद्ध लड़ पाएगी?
क्या नीति-नियति सिंहासन की,
कुर्सी का धर्म निभाएगी?
इस मानवता की खादी को,
दानव बनने से रोक सको।
तुम राजनीति के चेहरे से,
गिरगिटी मुखौटे नोच सको।
फिर से खादी सेवाधर्मी,
तन का हो जाए अलंकार।
कुछ उत्तर दो आगत कुमार!
*** सुनीता पाण्डेय 'सुरभि' ***
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