Sunday, 11 October 2015
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उर्वर भू यह भारत की - एक गीत
संतों की यह पावन धरती, अखिल जगत में न्यारी है। मातृभूमि को माता कहते, जन्म दिया बलिहारी है।। कलकल करती बहे जहाँ पर, नदियों की पावन धारा। ज...
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पिघला सूर्य , गरम सुनहरी; धूप की नदी। बरसी धूप, नदी पोखर कूप; भाप स्वरूप। जंगल काटे, चिमनियाँ उगायीं; छलनी धरा। दही ...
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जब उजड़ा फूलों का मेला। ओ पलाश! तू खिला अकेला।। शीतल मंद समीर चली तो , जल-थल क्या नभ भी बौराये , शाख़ों के श्रृंगों पर चंचल , कुसुम-...

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