Sunday, 9 November 2014

एक ग़ज़ल

सत्यं शिवं सुन्दरम् - साहित्य सृजन मेखला 
के साहित्यिक मंच पर 
मज़मून 27 में चयनित 
सर्वश्रेष्ठ रचना



बदलते हुए मौसमों के सताए।
 सुलगने लगे हैं दरख्तों के साए।।

बहारों के मौसम फुहारों के महीने।
 भटकते हुए बादलों ने रुलाए।।

दहकते हुए दिन उबलती-सी रातें।
 क़सम की क़सम चाँदनी भी जलाए।।

उजङते चमन सूखते पनघटों ने।
 कुँवारे दिलों के भी सपने चुराए।।

गगन की जमी से बढ़ी बेरुखी से।
 जिया भी न जाए मरा भी न जाए।।

बिना पात तरु पर बने घोंसले में।
 परिन्दा भी अश्कों के झरने बहाए।।

***रामकिशोर गौतम***


No comments:

Post a Comment

उर्वर भू यह भारत की - एक गीत

  संतों की यह पावन धरती, अखिल जगत में न्यारी है। मातृभूमि को माता कहते, जन्म दिया बलिहारी है।। कलकल करती बहे जहाँ पर, नदियों की पावन धारा। ज...