Saturday, 10 January 2026

तब बनते हैं शंकर - गीत

 

निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।
विष का प्याला पीना पड़ता, तब बनते हैं शंकर।।
करे समाहित उदिध सभी को, सरिता जो भी आई।
हृदय-सिंधु में कहाँ मनुज के, सागर सी गहराई।।
सदा विश्व कल्याण भावना, नहीं भरे अभ्यंतर।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
ताकतवर निज कोष लुटाता, विश्व-धरा हरसाने।
मानव नित सामान जुटाता, लोगों को तड़पाने।।
किसी अहिल्या लाज लूटने, बनता नित्य पुरंदर।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
तृषित धरा की प्यास बुझाने, वास्पित हुआ हमेशा।
सुख-दुख में समभाव रखे नित, देता यही सँदेशा।।
मनुज स्वार्थ की पूर्ति हेतु ही, रहता लगा निरंतर।।
निजी स्वार्थ के हेतु शक्ति सब, पाले मन के अंदर।।
*** चंद्र पाल सिंह 'चंद्र'

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