Sunday, 15 September 2024

मुक्तक - करुणा सागर

 

हिय विशाल हो रत्नाकर-सा।
प्यार-भरा करुणा सागर-सा।
भरा समन्दर हो आँखों में-
खारे जलनिधि के आगर सा॥1॥
🌸
गिरि शिखरों से नदियाँ आतीं।
अपनी-अपनी व्यथा सुनातीं।
अर्णव उनके दुख हर लेता-
हर्षित हिय सुरपुर सरि जातीं॥2॥
🌸
जल का पारावार उदधि है।
जीवन का आधार जलधि है।
विष अमरित चौदह रत्नों का-
अद्भुत दाता यह नीरधि है॥3॥
🌸
कुन्तल श्रीवास्तव.
डोंबिवली, महाराष्ट्र.

(शब्दार्थ : जलनिधि- समुद्र, सागर, खारे पानी की वह विशाल राशि जो चारों ओर से पृथ्वी के स्थल भाग से घिरी हुई हो। आगर- घर/ श्रेष्ठ/उत्तम, अर्णव - लहर उठाता हुआ महासागर/वायु/सूर्य/लहर/धारा, पारावार- आरपार/सीमा, उदधि- जलकी अधिक मात्रा/समुद्र, जलधि- पानी का खजाना/महासागर, नीरधि- जल धारण करने वाला/समुद्र।)

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