Tuesday, 11 June 2019

परहित सरिस धर्म नहिं भाई




परहित सरिस धर्म नहिं भाई, ग्रन्थों लिखी नजीर सखे।
ताल-तलैया बहती नदिया, पीती कब निज-नीर सखे।।


पीर-परायी जिन आँखों में, बहती गंगा-नीर सखे।
नीर क्षीर में रमा रमा पति, मंदिर बना जमीर सखे।।
रोम रोम में कोटि-देवता, थान जमाकर रास करें,
भाग्य पढ़े क्या उसका गुनिया, हाथों लिखी लकीर सखे।।1।।


भाग्य बाँचने वाला अक्सर, मिलता सदा फकीर सखे।
कर्मवीर ही निज हाथों से, लिखता निज तक़दीर सखे।।
छेनी ले कर दान नेत्र जब, संगतराश करे प्रमुदित,
मंदिर में भगवन की तब-तब, मुस्काती तस्वीर सखे।।2।।


सदा स्वार्थवश स्वार्थी रमते, डाल पैर जंजीर सखे।
काक दृष्टि-सी भाती जिनको, अपनी ही जागीर सखे।।
मन में रखते राग-द्वेष वह, चेहरे पर स्मित गहरी,
पीर पराई सुई बराबर, दुख अपना शमशीर सखे।।3।।


*** गोप कुमार मिश्र ***

No comments:

Post a Comment

उमड़-घुमड़ घन - कुण्डलिया

  उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर। छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर। । पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी। करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भा...