Sunday, 20 August 2017

थोथा चना बाजे घना


भ्रम
जी हाँ भ्रम
भ्रमित करता है
मन के दौड़ते अहंकार को,
अंतस के शापित संसार को।
क्षितिज पर धुएं का अंबार
अम्बर की नील पराकाष्ठा को
धूमिल तो कर सकती है
समाप्त नहीं।
सत्यता पारदर्शित होती ही है
अतिवाचालता अपने अस्तित्व के
खोखलेपन की द्योतक होती है
और दिग्भ्रमित होती है।
शब्द-शब्द बहुमूल्य है
शब्द ईश्वर के समतुल्य है,
अज्ञानी ही जो चाहे बोल जाते हैं
अपनी पोल खोल जाते हैं
चना थोथा हो तो बजेगा ही
जो घना हो वह तो सदा सजेगा ही।
अतिवाद अपवाद और वाद सृष्टि क्रम में
अनपेक्षित हैं
व्यक्ति जो अनावश्यक और ज्यादा बोले 

वह उपेक्षित है।

***** सुरेश चौधरी

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