Sunday, 11 June 2017

दो घनाक्षरी



जो भी हो मुझे पसंद, हो जाये वो रजामंद,
नाज़ जो उठाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
मानूं कभी उसकी मैं, वो भी मान जाए मेरी,
ताल जो मिलाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
हाँ में हाँ मिलाने वाले मिलेंगे कई मगर,
गलती बताये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
माँगे जो सभी की खैर, याद नहीं रक्खे बैर,
बस भूल जाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।।


********************************


मोती ज्यों हो सीप सँग, बाती जैसे दीप सँग,
साथ मेरे आये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
डूबे मेरे दुख में जो, और मेरी खुशियों में,
खुशी जो मनाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
रास्ते हों फूल भरे चाहे मिलें शूल भरे,
साथ जो निभाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।
एक एक मिलकर ग्यारह बन जाते हैं,
हाथ जो बढ़ाये सदा, साथी ऐसा चाहिए।।


***** गुरचरन मेहता 'रजत'

No comments:

Post a Comment

ब्रह्म का स्वरूप माँ

  सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ। जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ। दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती। कण्ठ से लगा कभी मम...