Sunday, 18 September 2016

एक गीत - मेरा दिल क्या कहता है



चुप सजदे में रहता है, 
मेरा दिल क्या कहता है ?

काँटों से ख़ुश हो खेला,
गहरे घावों को झेला
।
नादानी बस है ओढ़ी,
दिखता सबको अलबेला
।

सब रंज़ो-ग़म सहता है,
मेरा दिल क्या कहता है?


जब भी है जिसपे आया,
उस आशिक ने भरमाया
।
जब चाहा दिल से खेला,
जी ऊबा तो ठुकराया
।

कुछ भीतर भी ढहता है,
मेरा दिल क्या कहता है?


पूछे, किसकी सुनते हो?
जब भी सपने बुनते हो
।
टूटा मैं ही करता हूँ,
ऐसे पत्थर चुनते हो
।

रिस रिस लावा बहता है,
मेरा दिल क्या कहता है ?


***** मदन प्रकाश

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