ठिठुर रही है सृष्टि हमारी, छाया हुआ अँधेरा।
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥
हिम-कण बनकर शूल बरसते, मौन हुई है वाणी।
नदी-सरोवर बर्फ बन रहे, विकल हुआ है पानी।
सन्नाटे ने कसकर जकड़ा, दुःखों ने मुँह न फेरा॥
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥
महलों में तो शाल-दुशाले, वे सुख-नींद मगन हैं॥
निर्धन की कुटिया में देखो, कैसे बीत रहे क्षण हैं।
फुटपाथों पर सिसक रहा है, जिसका रैन-बसेरा॥
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥
नश्वर है यह काल-खण्ड भी, धीरज तुम मत खोना।
ऋतुओं का यह चक्र चल रहा, चकित नहीं तुम होना।
लौटेंगी स्वर्णिम किरणें फिर, होगा नया सवेरा॥
लिपट न पायी धूप धरा से, धुंध ने डाला डेरा॥
*** आचार्य प्रताप

रचना को पसंद और ब्लॉग तक लाने के लिए सादर आभार आदरणीय ।
ReplyDeleteसादर नमन एवं हृदयतल से कृतज्ञता।
ReplyDeleteमेरी रचना को सराहना प्रदान कर उसके चयन के माध्यम से उत्कृष्ट सृजन की गरिमा को प्रतिष्ठित करने तथा उसे अपने सम्मानित ब्लॉग पर प्रकाशित करने हेतु मैं आपका अनंत आभार व्यक्त करता हूँ।
यह स्नेह, प्रोत्साहन और विश्वास मेरे साहित्यिक पथ को और अधिक ऊर्जा व प्रेरणा प्रदान करेगा।