Sunday, 26 October 2025

प्रकाश पुंज - एक गीत

 

प्रकाश पुंज सूर्य से प्रदीप्त आभ पाइए।
घने तिमिस्र को मिटा सुरम्य पंथ लाइए।
उजास ज्ञान विश्व में स्व बाँटता रहा सदा।
सुतीक्ष्ण बुद्धि, अंध-पंथ काटता रहा यदा।
प्रभात रश्मि वाण साध लक्ष्य भेद जाइए।
प्रकाश पुंज सूर्य से प्रदीप्त आभ पाइए।
स्व अश्व रास साधना रथी अमान चेतना।
सुस्वर्ण आभ भाल-बिन्दु अंबरांत भेदना।
पतंग रूप शुभ्र भाव में दिगंत गाइए।
प्रकाश पुंज सूर्य से प्रदीप्त आभ पाइए।
प्रगाढ़ सप्त रंग राग अंग-अंग में सजे।
रचे अनंत चित्र माल पश्चिमी दिशा रजे।
भरें स्वभक्ति भाव में अथाह शक्ति छाइए।
प्रकाश पुंज सूर्य से प्रदीप्त आभ पाइए।
छुपे कहीं जरा प्रभा, मयंक आरसी सजे।
कला विधान नित्य ही नई सुयामिनी रजे।
प्रमाण पत्र बाँच पद्म बावली खिलाइए।
प्रकाश पुंज सूर्य से प्रदीप्त आभ पाइए॥
अंबरांत / क्षितिज
सुधा अहलुवालिया

No comments:

Post a Comment

ब्रह्म का स्वरूप माँ

  सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ। जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ। दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती। कण्ठ से लगा कभी मम...