Sunday, 29 October 2023

ऋतु अति हरसित

 

निशि अरु दिवस दिखत अति सुख कर।
उदित अरुण झट चल कर पथ पर।

सखि न इधर रुक उस थल पर चल।
ऋतु पिय मिलन सरस मधु उस पल।

मधुकर सरिस मधुर रस भर-भर।
हृदय-हृदय मिल बतरस कर-कर।

सुभग मनहरण चितवत हरियल।
जस विलसत सर खिलत कमल दल।

शुक पिक भ्रमत नचत अति हरसित।
विकसत सुमन नलिन सखि सर सित।

कुहु-कुहु कह पिक सबहि मन हरति।
प्रमुदित जन-मन विहँसत निरखति।

रमण करत मन थकित न धक-धक।
ऋतु अति सुभग हरत मन भरसक।

*** डॉ. राजकुमारी वर्मा ***

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