Sunday, 22 May 2022

भोर सुहानी

 



है भोर सुहानी, नवल कहानी, भँवरा गुन गुन, क्यों करता।
मतवाला आली, नज़रें काली, गुल के अधरों, पर धरता।।
चादर इक झीनी, बगिया भीनी, ओस पर्ण पर, इठलाई।
किरणों की डोली, चढ़कर भोली, भोर सहज ही, मुस्काई।।

अलसाए तारे, मद्धिम सारे, सुध बिसराए, अस्त हुए।
निद्रा को त्यागे, सुधिजन जागे, नित्यकर्म में, व्यस्त हुए।।
झिलमिल जली ज्योति, स्नेह भिगोती, ध्वनि झालर की, मन मोहे।
उल्लास बिखेरे, सुबह सवेरे, डाल पँखेरे, अति सोहे।।

कलियों ने खोले, घूँघट हौले, रंग चटक हैं, बिखराये।
रंगों की चितवन, उतरी तन-मन, शोक दुःख सब, बिसराये।।
तरु शोभा मण्डित, पुष्प सुगंधित, लता झूमकर, लिपटाई।
मुस्काती आई, ज्यूँ तरुणाई, धूप विचरती, है छाई।।

प्राची ने घोली, कुमकुम रौली, रक्तवर्ण रवि, झाँक रहा।
स्वर्णिम आयुध ले, जग की सुध ले, निज किरणों से, अंक गहा।।
कोकिल की बोली, मधुरस घोली, छोड़ नीड़ को, खग भागे।
मदमस्त मयूरा, नाचत पूरा, प्राणवन्त हो, जग जागे।।

*** आभा 'उर्मिल'

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