Sunday, 18 July 2021

पग-पग डगरिया



सींच गया माली प्रीतम सँवरिया।
प्रेम बेल बोकर पग पग डगरिया।
महक उठी क्यारी पवनौ दुलारे,
बेच रहा गंधी काँधे कँवरिया।
प्रेम बेल बोकर पग-पग डगरिया।

अंग - अंग बहके निबुआ रसीले।
जेवनौ न भावे तुम बिन छबीले।
प्रीत भरी जूठन लगे मनभावन,
षडरस फीको ये लागी बखरिया।
प्रेम बेल बोकर पग-पग डगरिया।

नेह लगाकर सावनी अमराई।
डँसन लगी रतियाँ खारी जुन्हाई।
अँगना खड़ी तके, सुधबुध बिसारे
कटे नहीं पलछिन साँझ दुपहरिया।
प्रेम बेल बोकर पग-पग डगरिया।

नैन हमारे ये दरश बिन तरसे।
कजरारी अँखिया मेघ जनु बरसे।
सीप बिना मोती, जलधि बिनु वारी,
प्यार भरीं बतियाँ सूनी अटरिया।
प्रेम बेल बोकर पग-पग डगरिया।

डॉ प्रेमलता त्रिपाठी 

No comments:

Post a Comment

उमड़-घुमड़ घन - कुण्डलिया

  उमड़-घुमड़ घन छा गए, नभ में चारों ओर। छम-छम छम-छम नाचते, पंख पसारे मोर। । पंख पसारे मोर, छटा अद्भुत मनहारी। करें नगाड़े शोर, मचा कोलाहल भा...