Sunday, 22 March 2020
भीतर का डर
बाहर के डर से लड़ लेंगे,
भीतर का डर कैसे भागे।
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बचपन से देखा है हमने अक्सर ख़ूब डराया जाता,
दुःख यही है अपनों द्वारा ऐसा क़दम उठाया जाता,
छोटी-छोटी गलती पर भी बंद किया जाता कमरे में,
फिर शाला में अध्यापक का डण्डा हमें दिखाया जाता,
एक बात है समता का यह लागू रहता नियम सभी पर,
निर्धन या धनवान सभी के बच्चे रहते सदा अभागे।
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बाहर के डर से लड़ लेंगे
भीतर का डर कैसे भागे।
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डर की यह बुनियाद सभी के बचपन में ही पड़ जाती है,
जैसे कील नुकीली कोई गहराई तक गड़ जाती है,
और यही डर धीरे-धीरे जीवन का बनता है हिस्सा,
और धर्म के आडम्बर में सोच अभय की सड़ जाती है,
जीवन की आपाधापी में भार दवाबों का इतना है,
पता नहीं है आगत में कब निद्रा से नूतन डर जागे।
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बाहर के डर से लड़ लेंगे
भीतर का डर कैसे भागे।
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हम सब ही जीवन में डर का नित सम्मान किया करते हैं,
अंध भक्त हों बाबाओं का क्यों गुणगान किया करते हैं,
कारण है जितने भी बाबा दिखलाते हैं डर ईश्वर का,
लाभ उठा इस भय का खुद को वे धनवान किया करते हैं,
जितने धूर्त गुरू होते हैं जीवन में अक़्सर देखा है,
उनकी सोच सदा रहती है लोगों की सोचों से आगे।
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बाहर के डर से लड़ लेंगे
भीतर का डर कैसे भागे।
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*** गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी ***
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बाहर के डर से लड़ लेंगे,
ReplyDeleteभीतर का डर कैसे भागे।
बहुत खूब महोदय...