Sunday, 13 October 2019

बस गान तेरा ही करुँ


 
पुष्प या बहु कंटकों से पथ भरा हो
हों प्रकीर्णित रश्मियाँ या कोहरा हो
जो तुम्हारे द्वार तक ले जाए मुझको
बस यही वरदान दो प्रभु! मैं सदा, उस पंथ पर ही पग धरूँ


नींद में होऊँ भले या चेतना में
हर्ष में होऊँ भले या वेदना में
एक पल भूलूँ नहीं तुमको कभी मैं
बस यही हे ईश कर दो, चित्त तुमसे ही सदा अपना भरूँ 


तीव्र लहरें हों भले या शांत धारा
दीखता हो दूर कितना ही किनारा
आ रही हो ज्योति तेरी जिस दिशा से
बस यही भगवान वर दो, नाव का अपनी उधर ही रुख करूँ


*** प्रताप नारायण ***

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