Sunday, 5 May 2019

जग का यही विधान


प्रीत पराई क्यों कहलाये।
जग का यही विधान सताये।


मर्म नहीं समझे जो अपना
मदिर नयन में झूठा सपना
धुंध रही पलकों में छायी,
बोझ उठाए तन का गहना।
है अनंत संघर्ष यातना,
नेह महावर क्यों बहलाये।
जग का यही विधान सताये। 


संचित होता पाप पुण्य है
अकथ जहाँ प्रिय प्रीति शून्य है।
व्यथा रहेगी अंतिम क्षण तक,
अगन लगाता पुत्र धन्य है,
अर्थ जहाँ जीवन भरमाये।
जग का यही विधान सताये। 


बहु संजोये जीवन थाती,
यम नगरी तक एक न जाती।
संदेश यही चेतन मन को,
दीप नहीं जलती है बाती।
स्नेह तंतु में भीगा मन भी,
दीन नयन जल से नहलाये।
जग का यही विधान सताये।


*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी ***

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