Sunday, 31 March 2019
बरवै छंद
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, बिन सब व्यर्थ।
मानव जीवन का हो, बस यह अर्थ॥
स्वर्ण मन लुभाये ज्यों, कलित कुरंग।
धन के पीछे भागे, तीव्र तुरंग॥
धन पाकर मन में यदि, उपजा लोभ।
अपनों का मन दुःखा, उर हो क्षोभ॥
धन संग्रह से बनना, नहीं अमीर।
उदार हृदय व्यक्ति ही, रहा प्रवीर॥
दुनिया के विकास का, एक सु-मंत्र।
सुस्थिर रहे सर्वदा, सु-अर्थतंत्र॥
नेता जी बाँट रहे, कई करोड़।
गर्दन हम सबकी कल, न दें मरोड़॥
देश बने सुदृढ़-सुखी, करे विकास।
'कुंतल' तन-मन-धन से, सबकी आस॥
🌸
*** कुन्तल श्रीवास्तव ***
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